Sunday, 10 December 2017

हसीनाबाद- गीताश्री

"हसीनाबाद" चर्चित कथाकार व पत्रकार गीताश्री का पहला उपन्यास है।  उपन्यास के नाम से ही स्पष्ट है कि नायिका प्रधान है। इस उपन्यास में खास बात है  वज्जिका संस्कृति और उस लोक की आत्मा , उसकी मिट्टी की सुगंध , जो अंत तक बांधे रहती है।  इसमें तीन औरते है, सुंदरी देवी, गोलमी कुमारी, और रज्जो। तीनों के माध्यम से लेखिका ने समय काल की स्त्रियों के संघर्ष को दिखाया  है।  सुंदरी देवी सामंती सत्ता में दबी कुचली वह स्त्री है जो हर सुबह अपने होने को तलाशती है।  जिसकी जिंदगी में हर रिश्ता अवैध है।जिसकी हर सांँस ठाकूर के रहमो करम पर अटकी है। जिसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता है। मगर  अपने भय पर विजय पा कर अपनी बच्ची के भविष्य के लिए अनजान व्यक्ति के साथ अनजान सफ़र पर निकल पड़ती है।

गोलमी को अपना भूत नहीं पता है मगर उसे क्या करना है , कहाँ जाना है, क्या पाना है उसकी आँखों में स्पष्ट है। उसे अपना लक्ष्य पता है और उसके लिए प्रतिबद्ध है।हृदय से भोली, निष्कलंक गोलमी का हृदय विशाल है और पृितसत्ता के हर चंगुल से आजाद सबको साथ लेकर आगे बढ़ती है और इस समाज से वो सम्मान और प्यार हासिल करती है जो हर स्त्री का हक है। इस तरह वह सुंदरी देवी के संघर्ष को भी मान दिलवाती है।

रज्जो का भी यहाँ जिक्र करना बहुत जरुरी है। नायिका  की चारित्रिक उँचाइयों के चित्रण के लिए ऐसे पात्र ही सहायक होते हैं। रज्जो  वो मतलबी व महत्वकांक्षी स्त्री है जो अपने   सपने पूरे करने के लिए अपनी दोस्त, अपने लोग, अपनी मिटटी को भी इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती।

गीता श्री  स्त्री विमर्श के लिए जानी जाती है। आप पर बोल्ड लेखन का यदा- कदा आक्षेप लगा है। मगर इस उपन्यास में ऐसा कुछ भी नहीं खोज पायेगें । बेहद सहज -संतुलित लेखन, कथा में प्रवाह इतना कि आप एक ही बैठकी में पढ़ जाएेंगे।

कहने को बहुत कुछ कहा जा सकता है। हसीनाबाद का दर्द है, लोक गीत की बहार है  ,राजनीति की दौड़ है , थोड़ी इतिहास की छौंक भी। प्रेम-दोस्ती, त्याग और धोखा भी ।

कई संवाद ऐसे है जो पढ़ते ही जुबान पर चढ़ जाते हैं।

जैसे "गोलमी सपने देखती नहीं बुनती है।"
बरहाल गीताश्री जी  को पहले उपन्यास के लिए बहुत बधाई।

Saturday, 9 December 2017

कविता 2017 दिसम्बर

1
ख्वाहिशे हजार वाट की आँखों में जलती हैं ।
जैसे गंगा में जलते हैं असंख्य दीये
गंगा आरती के आलाप के साथ ख्वाहिशे मन्नतों में बदलने लगती हैं।
मन्नतें फांसी बन जाती है.. बुधिया खेती करते कर्ज में डूब जाता है।

बाबुल मोहे काहे को ब्याहे विदेश..
ख्वाहिशों के दीये कुछ किनारे , कुछ बीच धार डूब जाते हैं
मुनिया की हसरतें छ्प्पर पर रख दी गई है।
बरसात एक दिन बहा देगी
कुछ चुल्हें की आग में झोंक देगी खुद ही.

कहीं टूटा है तारा
कई लह बुदबुदाते हैं अनायास
ख्वाहिशे फिर कहीं जागी है हौले हौले
अबकि बारिश हरी कर गई है हसरतें
बो गई है कई सपने
जगा गई हैं फिर उमंगे


2
वक्त की आँखों पर चढ़ा सदियों का सामंती धुंध
हर बार स्त्रीत्व को पऱखने के नये पौमाने गढे़

आत्मा पर चढ़े भय के कोहरे में कैद
एक ही धुरी पर घूमती रही स्त्री 

कोहरे को चीर नए रास्ते बनाने के जतन में
लहुलूहान करती रही सीना

जीवन के चाक पर अनजाने ही पीसती गई सपनो के बिरवे
कुचलती रही उँगलिया

एक दिन कहानी का पटाक्षेप होगा
बाऱिश की बुंदाबादी के बाद
आसमान के माथे पर लहकेगा सुनहरा सूरज

धरती के गर्भनाल से क्षितिज के सीने तक
समानता का सतरंगी इन्द्रधनुष चमकेगा
हरियायेगी धरती, टहकेगा बिरवा, फलेगा प्रेम
                                     महिमाश्री















कौन होनी चाहिए प्रेरणास्त्रोत- सीता,,रानी लक्ष्मीबाई ..या पद्मावती??

(सीता,रानी लक्ष्मीबाई,पद्मावती) सभी नारियों की परिस्तिथियाँ अलग थी और संदर्भ भी भिन्न थे। किसी का भी आचारण और निर्णय लेने की क्षमता उसके संघर्ष की जमीन और कारण में निहित होता है। सीता निसंदेह आत्मसम्मान से लबरेज़ महिला थी पर उनके जीवन को पति पत्नी , परिवार और समाज के संदर्भ में आदर्श मानना बेहतर हैं। वे एक विदुषी महिला, आत्मसम्मानी पत्नी, आदर्श माँ, बेटी और परिस्थितियों के अनुकूल एक बहादुर स्त्री थी। रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए उनका अपहरण करता है और उनकी प्रतिभा और सुंदरता से प्रभावित होकर पाना तो चाहता है पर बलात नहीं। वो वासना में पागल नहीं था। लक्ष्मी बाई को भी अंग्रेज अपने हरम में शामिल नही करने गए थे ना ही उनके लिए पागल थे। वे भारत के अन्य स्टेट की तरह झांसी को अपने अधीन करने गए थे। यहां न प्रेम है न ही सौंदर्य और न स्त्री के किये वासना। रही बात पद्मावत की तो ये जायसी ने पद्ममावत में राजा रानी के प्रेम को चित्रित किया है।पद्मिनी व रत्नसेन के प्रेम के मध्य ख़िलजी किसी भी प्रेम कहानीमें विलेन की तरह है। खिलजी पदमिनी और रत्नसेन के प्रेम के बीच खलनायक बन कर आता है जो पद्मावती को पाने के लिए हर कुकर्म करने को पागल है। विवाहित स्त्री के हवस में डूबा ख़िलजी अपनी सेना लेकर टूट पड़ता है। पदमिनी लड़ती जरूर लड़ती पर उसके पहले ही रत्नसेन दूसरे राजा द्वारा जिसने पद्मिनी को प्रेम पत्र लिख के उसे पाने का इजहार किया था उससे लड़ने में घायल हो जाते हैं और ख़िलजी के आक्रमण तक उनका प्राण पखेरु उड़ जाता है। प्रेम में डूबी स्त्री अपने प्रेमी पति की मृत्यु से आहत हो जाती है। ख़िलजी की विशाल सेना से हारने के बाद विधवा स्त्रियां अपनी रानी के साथ राजा की मृत्युं के कारण भयभीत हो कर जौहर कर लेती है। क्योंकि अंग्रेज हारी हुई प्रजा के स्त्रियों के साथ बलात्कार या हरम में शामिल नही करते थे न बोली लगाते थे मगर मुग़ल और अन्य मध्यकालीन आततायी का उद्देश्य ही होता था लूट खसोट ,औरतो का बलात्कार करना ,बेचना और जबरन धर्मपरिवर्तन । जौहर का पक्ष नही ले रही हूं पर जिनका नाम लिया गया है वे सभी अलग अलग परिस्थितियों में लिए गए अपने निर्णय के लिए जानी जाना चाहिए ना की उनका आपस मे तुलना होना चाहिए।

पद्मावती विवाद और भरतमुनी का नाट्य शास्त्र

भरतमुनि के अनुसार नाट्य प्रदर्शन की मुख्य रुप से दो शैलिया होती हैं " लोकधर्मी "और "नाट्य धर्मी".
लोकधर्मी वह शैली है जिसमें लोक का यर्थाथ वर्णन किया जाता है। जैसा समाज है, जैसे लोग हैं, जैसी उनकी समस्याएं इन सब की प्रस्तुति इस ढंग से कि जाए वह वास्तविक लगे। लोकधर्मी शैली के अर्तगत कला सिनेमा को रख सकते हैं। लोकधर्मी शैली में कल्पना नहीं होती । लोकधर्मी में समाज का वास्तविक चित्रण होता है।
नाटयधर्मी शैली कल्पनाशीलता पर आधारित होता है। इसमें लोक व्यवहार की घटनाओं को कुछ परिवर्तित कर अथवा अपनी ओर से कुछ जोड कर प्रस्तुत किया जाता है।इसमें झूमते - नाचते अभिनेता संवाद कहता है।  गीत, संगीत का समावेश होता है। मनोरंजन के तत्व ज्यादा होते हैं। बालीवुड की मसाला फिल्मों को इसी शैली में रखा जा सकता है।
भारतीय रंगमंच की कला का प्रदर्शन इसी दो शैली पर आधारित है।
भंसाली की फिल्में नाटयधर्मी शैली का बेजोड नमूना है। वे एक लाजबाव चितेरा हैं। अपनी कल्पना से रंगीनविशाल कैनवस रंचते है। जिसकी सुंदरता में दर्शक ऐसे डूबते हैं कि तीन घंटे कैसे बीत जाते है पता नहीं चलता। वे हमारे समय के महत्वपूर्ण बेमिसाल निर्देशक हैं।
पद्मावती निंसदेह बहुत ही खूबसूरत फिल्म होगी.। बिना देखे उस पर बोलना गलत हैं। अगर उन्हेोंने किसी ड्रीम सिक्वेंश में पद्मावती को खिलजी की बांहो में दिखाया है तो गलत कैसे हो सकता है। इसे आप बिना देखे प्रेम-प्रसंग दिखाना कैसे कह सकते हैं। अपनी कल्पना से किसी गाने में खिलजी के लस्ट को दिखाने की कोशिश की होगी। पद्मिनी के प्रति उसकी आसक्ति, उसे पाने की लालसा को दिखाया होगा। ये मेरा अनुमान है। और ऐसा दिखाया है तो स्वाभाविक है। क्योंकि कोई भी पुरुष अगर किसी स्त्री पर आसक्त है तो अकेले में उसे ऐसे ही सोचेगा। इसमें अपमान की बात कहाँ से आ गई। ये फिल्म है दोस्तों । उन्होंने कोई डोक्यूमेंट्री नहीं बनाई ।
और नाट्यशैली में रची बसी फिल्मों सें कल्पना का सहारा ले अंगो के माध्यम से किसी दृश्य को साकार किया जाता है। जिसे आंगिक अभिनय कहा जाता है।
क्या टीवी सीरियलों में कथानक नहीं बदले जाते। मैंने चंद्रगुप्त मौर्य पर आधारित सीरियल "चद्र नंदिनी" के कुछ एपिसोड देखे । इतिहास से उसका दूर दूर तक का नाता नहीं था। फिर भी सीरियल चलता रहा। ऐसे एक नहीं कई सोप चलते रहते हैं और दर्शक देखते भी रहते हैं।जिसमे ऐतिहासिक पात्रों का नाम, परिवेश, औ पोशाक इस्तेमाल किया जाता है पर कहानी कुछ और दिखाई जाती है।

Saturday, 20 May 2017

सरकार और नक्सलियों के बीच पीसते आदिवासी

बीते कुछ सालों में जब भी सरकार दावा करती है कि देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। उसके कुछ महीने बाद ही नक्सली सेना पर दुर्दांत हमला कर आंतक का ऐसा कहर बरपाते है कि महीनों भोले-भाले आदिवासियों और सरकार की नींद उड़ जाती है।
ऐसा ही आतंक फिर से 24 अप्रैल को सुकमा जिले के बुरकापाल में नक्सलियों ने बरपाया। आदिवासी महिलाओं को आगे कर सीआरपीएफ के 26 जवानों को भून डाला गया।सीआरपीएफ के ये जवान उन मजदूरों के सुरक्षा के लिए तैनात थे जो दो हाईवे को जोड़ने वाली सड़क बना  रहे थे। बताया जा रहा है कि 300 नक्सलियों में 50 महिला नक्सली भी शामिल थी।इस हमले के बाद बुरकापाल में दहशत के बादल छाये हुए हैं। आदिवासियों के ऊपर डर और प्रताड़ना के दो धारी तलवार लटक रहे हैं।
आस-पास के सभी गाँव वीराने हो गये है । गाँव में दूर दूर तक कोई नजर नहीं आता।गाँव की ये वीरानी बेहद डरावनी है ।इका दुका महिलाएं और कुछ बुजर्ग दिख जाते हैं । मगर वे भी बातचीत से बचना चाहते हैं। उनका कहना है कि अधिकांश गाँववाले माओवादिओं के डर और सुरक्षा बलो के पूछताछ से बचने के लिए भाग गये हैं।
नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच फंसी आदिवासी जनता की जान सांसत में फंसी हुई है। भय और असुरक्षा के बीच दो पाटो में पीस रही है।
यह पहली घटना नहीं है।इससे भी बड़ा हमला नक्सलियों ने 2010 में  दातेवाड़ा के पास कर सीपीआरएफ के 76 जवानों को भून डाला  था
पहले से ही इन इलाको में अथाह गरीबी है।खाने के लिए राशन तक नहीं है। किसी भी प्रकार का रोजगार, अस्पताल और स्कूल नहीं है। आदिवासी महिलाओं और बच्चियों के साथ आये दिन दुर्व्यवहार और शारीरिक शोषण , बलात्कार आम बात है। स्थानीय पुलिस हर आदिवासी को नक्सलियों से मिला समझकर शक की निगाह से देखती है। सब पर कड़ी नजर रखती है।थोड़ा सा भी संदेह होने पर उन पर जुल्म करती है। कई बार उन्हें फर्जी मामलों में पकड़ कर जेल में  भी डाल देती है।
पुलिस और सीआरपीएफ मान के चलते हैं कि ये आदिवासी नक्सलियों से मिले हुए होते हैं। किसी भी घटना के बाद सीआरपीएफ उन्हें डरा धमका के जाती है।
उधर नक्सली भी इन भोले आदिवासियों को सीआरएफ और पुलिस से बचाव के लिए इस्तेमाल करते हैं।साथ ही उन्हें पुलिस का मुखविर समझ कर संदेह भी करते है। कभी भी माओवादी उनके गांव में आ कर फर्मान जारी कर जाते हैं कि गाँव खाली कर दो।
जंगलों, पहाड़ो से ढकी छत्तीसगंढ की धरती खनिज संसाधनों से पटी हुई है। यहाँ की मिट्टी सोना, हीरा , कोयला , लोहा सब उगलती है। ।सरकार और निजी कम्पनियों द्वारा जब अंधाधुन खनन शुरु हुआ तो उसके लिए हरे-भरे पेड़ काटे जाने लगे थे । उत्खनन के लिए हजारों पेड़ों की बलि दे दी गई।जिसका असर वहाँ की नदियों पर भी पड़ा। वो सुखने लगी। आस-पास खेती लायक जमीने नहीं बची। आदिवासियों की उपजाऊ जमीने बंजर हो गई और साथ ही सदियों से चले आ रहे आदिवासियों की जीवन-पद्धति भी बिगड गई। आदिवासी नहीं चाहते थे कि उनके संसाधन छिने जाए । होना तो यह चाहिए था उनकी जमीनों पर खनन के बाद हुए लाभ में सरकार को शेयर देना चाहिए था। परंतु आदिवासियों के  हाथ कुछ भी  नहीं आया। बल्कि अपनी धरती से वे बेदखल कर दिए गए। नक्सली इस समस्या का फायदा उठा कर इन क्षेत्रों में फैल गए । आतंक का पर्याय नक्सलवाद अब यहाँ एक उधोग बन चुका है। वे सरपंच को मार देते हैं। गाँव में पटवारी को आने नहीं देते।
जाहिर है नक्सली इन इलाकों में विकास नहीं होने देना चाहते । विकास का मतलब है , सड़क, रोजगार, स्कूल, अस्पताल, पुलिस चौकी, सुरक्षा और सरकारी तंत्र द्वारा सब कामकाज। नक्सली अपनी समनान्तर सरकार चलाना चाहते हैं।एक खास विचारधारा को पोषित कर अपनी मनमानी करना चाहते हैं।जंगल से गांव , गांव से शहर तक अपना सम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं।
2005 में सलमा जुडूम को बैन करने के बाद आदिवासियों के पुर्नस्थापन के लिए सरकार ने कई योजनाएँ बनाई। मगर वे सिर्फ कागजी ही रह गई जमीनी तौर पर कभी भी कार्यन्वयन नहीं हुआ। आंतक के साये में जी रहे आदिवासी पहले भी अपनी धरती छत्तीसगढ़ के कई  नक्सल प्रभावित इलाको से पलायन कर आंध्र और दूसरे राज्यों में जा कर बस गये । मगर वहाँ भी नारकीय जीवन जी रहे हैं।
इन समस्याओं के जानकारों का कहना है कि अगर राज्य सरकार चाहे तो नक्सलवाद को समूल खत्म कर सकती है। इसके लिए केंद्र सरकार , राज्य सरकार, राज्य पुलिस , और मिलिट्री फोर्स की टीम बननी चाहिए। जिनका आपस में सही तालमेल हो। साथ ही नक्सवादियों से शांतिवार्ता भी करने का प्रयास होना चाहिए।साथ ही आदिवासी समुदाय को अपनी धरती अपने संसाधनों पर हक के साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान किया जाना चाहिए।


Sunday, 26 June 2016

मेरा नजरीया- श्री दिलबागसिंह विर्क

आशा, निराशा, अविश्वास और विरोध की बात करता संग्रह
कविता-संग्रह – अकुलाहटें मेरे मन की
कवयित्री – महिमा श्री
प्रकाशक – अंजुमन प्रकाशन 
पृष्ठ – 112 ( पेपरबैक )
कीमत – 120/- ( साहित्य सुलभ संस्करण के अंर्तगत 20/- )
समाज में व्याप्त बुराइयाँ, भेद-भाव हर भावुक इंसान को व्याकुल करते हैं | कवयित्री ‘ महिमा श्री ’ भी इसी व्याकुलता को अपने कविता संग्रह “ अकुलाहटें मेरे मन की ” में अभिव्यक्ति करती है | समसामयिक मुद्दों को लेकर भी उनकी कलम चलती है और शाश्वत मुद्दों पर भी |
स्त्री होने के नाते स्त्री वर्ग की समस्याओं को उठाना स्वाभाविक ही है, लेकिन कहीं-कहीं वह पुरुष वर्ग के खिलाफ उग्र रूप भी धारण करती है | तेज़ाब फैंके जाने की घटना पर लिखी कविता ‘ तुम सब ऐसे क्यों हो ? ’ में वह पुरुषों को धिक्कारती है | ऐसे लगता है कि उसे पुरुष जाति के ऊपर विश्वास ही नहीं | हर पुरुष जैसे वहशी हो, तभी तो वह लिखती है –
आदमी की भूख / उम्र नहीं देखती / ना ही देखती है /
देश, धर्म और जात / बस सूंघती है / मादा गंध ( पृ. – 17 )
इसी वहशीपन को देखते हुए वह कहती है –
फंसना नहीं है मुझे / तुम्हारे जाल में
( पृ. – 36 )
वह पुरुष को चेतावनी भी देती है –
स्वामित्व के अहंकार से / बाहर निकलो / सहचर बनो /
सहयात्री बनो / नहीं तो ? हाशिये पे अब / तुम होगे ( पृ. – 38 )
इस धरती पर हो रहे विनाश का कारण वह मनु-पुत्रों को ठहराती हुई उनसे प्रश्न करती है –
अरे ओ श्रेष्ठी / बेचकर धरती की गोद /
कहाँ अब सुख की नींद पाओगे ? ( पृ. – 88 )
उसे पुरुष का न तो देवता होना स्वीकार है, और न ही उसके साथ चलने की ललक है वह तो उसे कहती है –
भरमाओ मत / देवता बनने का स्वांग / बंद करो /
साथ चलना है, चलो / देहरी सिर्फ़ मेरे लिए / हरगिज नही... ( पृ. – 37 )
पुरुष पर अविश्वास तो है ही, साथ ही दहेज, भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं समाज में हो रही हैं | मिथिहास में वह रावण के व्यवहार, अहिल्या की प्रतीक्षा और अग्निपरीक्षा जैसी घटनाओं से व्यथित है, इसीलिए वह कहती है कि कैसे करूं मैं प्रेम ? और अगर वह प्यार करती भी है तो उसे शर्तें मिलती हैं, जो उसे स्वीकार नहीं, इसलिए वह कह उठती है –
अब बचके चलती हूँ हर तूफ़ान से
( पृ. – 105 )
वह न सिर्फ़ प्यार से बचना चाहती है, बल्कि पिता द्वारा वर ढूंढें जाने के भी विरुद्ध है –
खर्च कर लाखों लाते हो / छानबीन कर एक जोड़ी अदद हाथ /
जो बनेगा तुम्हारी बेटी का जीवन रक्षक /
पर क्या होता है सही ये फैसला हर बार
( पृ. – 39 )
वह स्त्री को याद करवाती है –
शोक गीत गाओ / भूल गयी / तुम स्त्री हो ! ( पृ. – 16 )
लड़की की दास्ताँ को दो कविताओं में ब्यान करते हुए, वह लड़की को भी चेताती है –
उत्सव तो / अगले जन्म में नसीब होगा /
या / कई जन्मों के बाद ( पृ. - 87 )
लेकिन वह बदलाव की तरफ इशारा भी करती है –
समझा हमें अभी तक / अबला और ना जाने क्या-क्या /
की हर धारणाएँ तोड़ने की / घड़ी आई है अब ( पृ. – 67 )
वह पिता को आह्वान करते हुए कहती है –
भरो उनमें साहस / दो उनकी उड़ान को दिशा /
राह में मत रोको, मत टोको / बनो मार्गदर्शक /
जब तक नहीं बनेगी साहसी / तब तक कभी भी /
कहीं भी नहीं रहेगी सुरक्षित / समाज में बेटियाँ ( पृ. – 39 )
समाज में पुरुष-स्त्री की दशा ही उसे विद्रोही बनाती है, और वह कह उठती है –
मैं करूंगी प्रतिकार / तुम्हारे समाज से
( पृ. – 77 )
हालांकि उसे यह भी लगता है कि –
परंपरा की ये थाती / मैं भी संभालुंगी एक दिन ( पृ. – 40 )
पुरुष-स्त्री संबंधों से हटकर देखें तो उसे माँ से लगाव है, माँ से जुडी यादें उसे भूलती नहीं | माँ के बारे में वह लिखती है –
तुम्हारी गोद ही मेरा स्वर्ग है माँ /
तुम्हारा स्नेह ही तो मेरी संजीवनी /
माँ तुम हो तभी मैं हूँ ( पृ. – 55 )
माँ का बताया जीवन-दर्शन उसे याद है –
तुमने ही कहा था न माँ / चिड़िया के बच्चे /
जब उड़ना सीख जाते हैं / तो घोंसलों को छोड़ /
लेते हैं ऊँची उड़ान / और दूर निकल जाते हैं ( पृ. – 35 )
शायद इसी दर्शन का प्रभाव है कि वह चुने हुए रास्तों पर चलना नहीं चाहती –
रोको मत मुझे / तुम्हारी मंज़िल नहीं चाहिए /
अपना रास्ता चुन लिया है मैंने / भटकने दो, भटकूँगी /
पर वो भटकन मेरी होगी ( पृ. – 13 )
वह उड़ना-दौड़ना चाहती है, प्रकृति को गोद में समेटना चाहती है, घने जंगलों में खोना चाहती है | वह कहती है कि रोको मत, ठहर नहीं पाऊँगी | वह सागर-सी विशाल, हिमाला-सी ऊँची, चांदनी-सी उज्ज्वल और ध्रुव तारे-सी अटल होना चाहती है |
वह आशावाद और निराशावाद के बीच झूलती है | जीवन में आने वाले अनेक दोराहों से गुजरने की बात करती है | उसका मानना है कि भावुक लोगों को दुनिया वाले उपेक्षा का पात्र समझते हैं, क्योंकि वे वहशीपन की दौड़ में शामिल नहीं होते | ज़िन्दगी को समझना चाहती है, तो नतीजा ढाक के तीन पात मिलता है | निराशा जब हावी होती है तो –
जीवन रीता-सा लगता है / सब रंग फीका लगता है ( पृ. – 97 )
भीतर खालीपन दिखता है –
बतकही कितनी भी कर लूं /
रहता है खाली खाली अन्तस का कोना ( पृ. – 31 )
इसी निराशा के कारण वह खुद को अपने भीतर समेट लेती है –
मैंने कहीं भी नहीं खुले रखे हैं दरवाजे /
डाल रखे हैं दरवाजों पे बड़े-बड़े ताले / ( पृ. – 29 )
निराशा के कारण वह विनाश चाहती है, लेकिन इस निराशा में भी नव सृजन की आशा निहित है –
सब खत्म हो जाने दो / तभी शायद शुरू होगा /
सृजन का नया दौर ( पृ. – 106 )
आशावाद की और भी बहुत-सी झलकियाँ इस संग्रह में मिलती हैं | अँधेरा तो क्षणभंगुर है –
सूरज को तो आना है प्रतिदिन /
घनघोर अँधेरा तो मेहमान है / कुछ पल का ( पृ. – 23 )
वह दृढ़ता पर से चलने की पक्षधर है –
अँधेरा घना है तो क्या / रास्ते बंद हैं तो क्या /
चल पड़ो दृढ़ता के साथ ( पृ. – 96 )
वह हिम्मत न हारने का संदेश देती है –
ईश्वर ने तुम्हें गर / नर्क दिया है तो / स्वर्ग का रास्ता भी /
कहीं खुला रखा होगा / बस / हिम्मत मत हारना ( पृ. – 50 )
वह नियति को चुनौती देती है –
इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा / उसी पल तू हर जाएगी ( पृ. – 52 )
आशा-निराशा के अतिरिक्त वह जीवन की नश्वरता में विश्वास रखती है –
सूरज का उदय के बाद डूबना / दिन के बाद रात का आना /
शायद यही सच है ( पृ. – 61 )
लेकिन इस सच से घबराना कैसा –
है अंत सभी का एक दिन / तो फिर घबराना कैसा ( पृ. – 23 )
इस सच को जानते हुए वह जीवन के हर पल में स्वीकृति को महत्त्व देते हुए यह संदेश देती है –
बाँहें फैलाकर स्वीकार कर लो / जिसे व्यर्थ समझ ठुकराया था अब तक /
क्योंकि तभी आसां हो पाएगी / मृत्यु के इन्तजार की अवधि ( पृ. – 32 )
और इसी स्वीकृति का परिणाम उसकी यह जीवन शैली है –
ज़िन्दगी / कभी नदी-सी / कभी टुकड़ों की
जैसे भी पाया / बस जी डाला ( पृ. – 33 )
वह आदमी की त्रासदी से परिचित है –
मगर वो नहीं जानता कि / मृगमारीचिका की इस स्थिति में /
उसे सिर्फ़ रेत ही मिलेगी / और शायद हर आदमी की /
यही त्रासदी है ( पृ. – 26 )
उसे कल्पना पर अविश्वास है –
आकाश में तारे गिनने / या दिन में सपने देखने से /
होता नहीं कुछ हासिल ( पृ. – 75 )
हालांकि वह इसके दूसरे पहलू को भी देखती है – कल्पना के पर लग जाना ही / मनुष्य की सुखद स्मृतियों का /
पहला अहसास है ( पृ. – 26 )
कवयित्री भारतीय सभ्यता और संस्कृति का गुणगान करती है | सैनिकों के लिए दुआएं मांगती है | बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य करती है | उसे लगता है सद्दाम और गांधी महत्त्वकांक्षाओं का परिणाम होते हैं | जीवन में क्या-क्या असरदार है, इसका वर्णन करती है, लेकिन वे असरदार क्यों हैं, यह नहीं बताती | उसे लगता है मृत्यु शैय्या पर लेटे आदमी के सपने छूटने लगते हैं | साथी के मौन पर दीवारें, दरवाजे मुखर हो उठते हैं | लौटना उसे मुमकिन नहीं लगता | बीतने भर से बात नहीं बीत जाती, क्योंकि बीते कल का हिसाब होता है, लेकिन साथ ही वह यह भी कहती है, कि समय के हर पल का हिसाब नहीं होता | समय भले आगे चलता है, लेकिन मन आगे भी चलता है तो पीछे भी | उसे लगता है कि सुख हवा के झोंके की भांति सरसरा कर निकल जाता है | वह चीजों को दूर नहीं पास देखने में विश्वास रखती है –
कहीं दूर भटकने से बेहतर है / अपने पास ही ढूंढें
वहीं कहीं हमारी जमीन मौजूद है ( पृ. – 68 )
वह अपने गाँव को याद करती है, किसानों की दुर्दशा का चित्रण करती है | सावन ऋतु का वर्णन करती है, सावन की बारिश में गरीबों की दशा को देखती है | दंगों के बाद आदमी की दुविधा का वर्णन करती है | लन्दन में गायों के कत्लेआम पर कृष्ण को पुकारती है | परेशान ज़िन्दगी से बचाने के लिए कोई तो आए, इसका निवेदन करती है | चाँद-चांदनी के माध्यम से संदेश देती है –
एक दूसरे के बिना / नहीं चलता यह संसार ( पृ. – 84 )
पानी का महत्त्व दर्शाते हुए लिखती है –
जल बिन मछली मर जाए / औ बिन जल सब मछली बन जाएँ ( पृ. – 89)
वह नकाब रहित होने के पक्ष में है –
दुनिया गर नाटक है तो / हम कब तक रहेंगे एक्टर
कभी तो आने दो हमको / जो हैं हम / हम बन कर.... ( पृ. – 44 )
कविता में महत्त्व भाव का होता है या शिल्प का, इस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता | कवयित्री की नजर में कविता क्या है, इसे वह बड़े सुंदर ढंग से कहती है –
कविता कुछ इधर-उधर से / जोड़े गए शब्दों का /
जमघट नहीं होता / बल्कि उसमें होता है /
अनछुआ दर्द / एक ख़ामोशी, एक अहसास ( पृ. – 70 )
भले ही कवयित्री शब्दों से ज्यादा महत्व अहसास को देती है , लेकिन इस संग्रह में शब्दों की कलात्मक पेशकारी हुई है | कवयित्री ने पद मैत्री, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का भरपूर प्रयोग किया है | विरोधी शब्द युग्म की भी भरमार है, लेकिन इससे कविता की सुन्दरता में बाधा नहीं पहुंचती, अपितु सौन्दर्य बढ़ता ही है | कवयित्री की शैली वर्णनात्मक है, लेकिन अनेक दृश्य भी आँखों के सामने उभरते हैं | संबोधनात्मक शैली का भी भरपूर प्रयोग हुआ है | छंद मुक्त है, लेकिन तुकांत के अनेक उदाहरण मिलते हैं |
संक्षेप में, यह संग्रह कवयित्री की आकुलता को भी ब्यान करता है और उसके उग्र तेवरों को भी | भाव पक्ष और शिल्प पक्ष दोनों दृष्टि से अनेक संभावनाएं जगाता है |

दिलबागसिंह विर्क
95415-21947ो

नई ग़जल... आदमी ग्लोबल हुआ