Thursday, 11 October 2012

नियति तू कब तक खेल रचाएगी ..

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नियति तू कब तक खेल रचाएगी

क्या हम सचमुच हैं

तेरे ही कठपुतले

तू जैसा चाहेगी

वैसा ही पाठ सिखाएगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कभी कुछ खोया था

कंही कुछ छुट गया था

कभी छन् से कुछ टूट गया था

भीतर जख्मो के कई गुच्छे हैं

गुच्छो के कई सिरे भी हैं

पर उनके जड़ो का क्या

तेरा ही दिया खाद्य औ पानी था

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कंही कुछ मर रहा है

कंही कुछ पल रहा है

दावानल सा हर कहीं जल रहा है

क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है

नियति तू कब तक हाहाकार मचाएगी

बंद करो मानवता के साथ


अपना क्रूर हास परिहास

नियति तू एक दिन पक्षताएगी

इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगी


उसी पल तू हार जाएगी

खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी

शर्म से क्या नहीं तू उस दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

असरदार होता है ..




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असरदार  होता  है
कभी  उम्मीदों  का  टूटना
टूट के   बिखर  जाना
कभी अकेले  दीवारों से बातें  करना
कभी  शाम छत पर   बैठ
पंछियों  को  घर   लौटते  देखना
कभी  गर्म  रेत  पर  बैठ
समुन्दर  की  गहराई   नापना
उठ्ठी  गिरती  लहरों  को देख
हजार अगली -पिछली बातों का तौलना 
या कभी आंगन   में  बैठ  पड़ोसी  के  पतंग को
ऊँचे  उड़ते  देख मुस्का देना 
असरदार  होता  है
कभी जाने अनजाने  रास्तें   भटकना 
और फिर भटकते हुए 
वापस  अपने  घर  को  आना
या उम्मीद से परे   कोई  अजनबी का 
मदद कर जाना 
और अपनों का उम्मीदें तोडना
 असरदार होता है

हर बार क्यूँ ऐसा होता है .....



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हर बार क्यूँ ऐसा होता है
जब भी कुछ अपना सा लगता है
वो होकर भी अपना नहीं होता है
एक दूरी सी बन जाती है
एक निराशा सी घिर जाती है
समय की धार में सब यूँ बह जाता है
जैसे बंद मुठ्ठी से फिसलती  रेत
जीवन रीता रीता सा लगता है।
सब फीका फीका सा लगता है।
नींद नहीं आती है।
ख्वाव रूठ जाते हैं।
अपने बेगाने लगते है।
हर बार क्यूँ ऐसा होता है
हर कोशिश बेकार जाती है।
हर दुआ हवा हो जाती है।
शब्द शूल बन जाते हैं।

जाने अनजाने पापो का लेखा जोखा ले कर हम बैठ जाते है
या फिर सोचते है
है कोई  पिछले जनम की भूल
हर बार क्यू ऐसा होता है ।




भीड़


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हां भीड़ में शामिल
मैं भी तो हूँ
रोज
अलसुबह उठ के
जाती हूँ
शाम को आती हूँ
दूर से देखती हूँ
कहती हूँ
ओह देखो तो जरा
कितनी भीड़ है
और फिर
मैं भी भीड़ हो जाती
 

तुम्हारा मौन


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तुम्हारा मौन
विचलित कर देता है
मेरे मन को
सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे
दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे

Wednesday, 10 October 2012

एहसास

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समुन्दर कभी शांत नहीं होता 
ना ही कभी सोता है ।
जब तुम मेरे पास न हो तो 
कुछ ऐसा ही होता है ।
लहरों की चंचल परियां 
उथल पुथल मचाती हैं ।
मन के आँगन में मेरे 
चिंता के पल दे जाती हैं ।
तुम पास नहीं मेरे 
पर एहसासों  का माधुर्य तो है
जो पल साथ बिताएं हैं ।
उस पल का संबल तो है   ।