Sunday, 7 September 2014

मैरी कोम -एक नजर






मेरा नजरिया :-----

मैरी कोम :एक बेहतरीन निर्देशन के साथ शानदार अदाकारी का नमूना है.इसके लिए निर्देशक ओमंग कुमार और प्रियंका व् अन्य सहायक कालाकार बधाई के पात्र है ..एक बार अवश्य सभी को देखना चाहिए ... 

 इसकी तुलना भाग मिल्खा भाग और चक दे इण्डिया से किया जा रहा है  जो स्वाभाविक है ..

पर ये फ़िल्में बायोग्राफी हैं किसी भी की तुलना किसी से नहीं कर सकते .. तीनो फिल्मों का कालखंड और जीवनविसंगतियां एक दुसरे से भिन्न है .. समस्याएँ भिन्न हैं .

मिल्खा जी ऐसे कालखंड में जन्मे हैं जहाँ विभाजन का दर्द हैं ,माता पिता ,नाते -रिश्तेदार ,मित्र और अपने सरजमीं से बिछड़ने का अकल्पनीय दर्द है .. और इन सबके बिच आपने आपको जिन्दा रखने का फिर अपनी प्रेयसी से बिछड़ने का उसके बाद पुन: अपने जीने की वजह को ढूढने का ...मिल्खा का जीवन बहुत बड़े प्लेटफोर्म तैयार करता है अपने साथ हमें जीवन की कई विसंगतियों से रूबरू करवाता है जिसकी अब हम कल्पना भी नहीं कर सकते ..और उन सबके बिच मिल्खा अपनी कई कमजोरियों और कमियों के बावजूद अपनी जिजीविषा की वजह से विजेता बन कर उभरता है और अपना और देश दोनों की पहचान दिलवाता है ..

वहीँ मैरी कोम एक ऐसी जिद्दी लड़की के सपनों की कहानी है जिसे बचपन से पता है उसे क्या करना है और इसके लिए वो सबको अंतत: अपनी लगन और कड़ी मेहनत से अपने पक्ष में कर लेती है ..मैरी कोम एक ऐसी लड़की है जो कभी डरती नहीं .. इस फिल्म में निर्देशक ने कई मुद्दों को सफलतापूर्वक मैरी कोम के बहाने भारतीय समाज के सामने लाने में सफ़ल रहा है ...

१.अगर सपनों को पूरा करने का साहस है तो एक लड़की भी चाहे तो कितना भी विरोध क्यों न हो या रास्ता कितना भी कठिन हो वो सफ़ल हो सकती है

२.मैरी कोम के पति हमारे समाज के लिए उदाहण बन कर उभरते हैं ..की किस प्रकार एक पति भी त्याग, समर्पण एवं पत्नी के लिए अटूट संबल बन सकता है और पत्नी की भावनाओं को समझ कर उसके सपनो को पूरा करने के लिए कटिबद्ध हो सकता है ..

(चलो अब सती ,सीता और सावित्री की कहानी में एक मोड़ तो आया ..भगवान् का लाख लाख शुक्र है  )

३.निर्देशक ने मैरी कोम के बहाने एक जटिल और ज्वलंत मुद्दे को सबके सामने रूबरू करवाया है ..और वो है . उत्तरपूर्वी .(.नार्थईस्ट) भारतीय समाज का अन्य प्रान्तों से कटे होने की वजह से अनभिज्ञता और उपेक्षा , उनके नैन नक्स की वजह से विदेशी समझे जाने की शर्मनाक भूल ..और हरबार उन्हें विदेशी करार देने का दंश जिसे मैंने दिल्ली में अपने सामने हजार बार होते देखा और उनके तकलीफ को महसूस किया है ..उन्हें चायनीज समझना और चिंकी से संबोधित करना (चिंकी शब्द पर अब बैन लग चूका है अगर कोई भी इसका उच्चारण करेगा तो उसे जुर्माना भरना पड़ेगा )

जब मैरी कोम चीख के कहती है मैं  मणिपुरी हूँ  इस लिए ये सब कर रहे हो मेरे साथ ..ये उसी उपेक्षा से उपजे दर्द है की चीख है ...

४.चौथा मुद्दा भी अपने आप में महत्वपूर्ण है ..किस प्रकार हमारे देश के खिलाडियों के साथ फेडरेशन वर्ताव करता है ...उन्हें प्रोत्साहित करने के बजाए उनके फण्ड के पैसे का दुरपयोग अपने ऐश के लिए करता है और उन्हें आवश्यक ट्रेनिग के विशेष खान पान भी मुहैया नहीं करवाता तभी खिलाड़ी अपनी जी जान लगा कर खेलते हैं

इन चार मुद्दों की वजह से मैरी कोम को एक बार तो देखना बनता है उनकी महान उपलब्धियों ..... साथ ही हमारे देश के लिए इनका जो योगदान है ..उसे समझने के लिए भी
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