Sunday, 14 December 2014

तुम सब ऐसे क्यों हों ?


ये कविता उन सभी बहनों को समर्पित हैं जो दुर्भाग्य से इस सभ्य समाज के तथाकथित मानसिकता की शिकार हो कर अपनी जिंदगी के हसीं  लम्हों से वंचित हो गयी है ..कल उनके साथ समय बिताने का मौका मिला उनके ज़ज्बे को प्रणाम  इतना सहने के बाद भी सर उठा कर जीवन के चुनौतियों का सामना कर रहीं है ....


क्या किया है तुमने
तुम्हें थोडा सा भी आभास है क्या
मुठिओं में भीच कर बैठे  हैं हम
अपने ज़िन्दगी के किरर्चें
हसीं चेहरे के साथ
लहुलुहान कर दिया हमारी  आत्मा
तुम सब ऐसे क्यों हों ?
हम प्रेम भी करें तुम्हारे कहने पर
उठे ,बैठे , खाए ,सोये , घुमे तुम्हारे चाहने पर
नहीं तो मिटा डालोगे ?
क्यों हो तुम सब ऐसे ?
हैवानियत की अभी कितनी हदें बाकी है
बताना तो जरा ?
मुखोटे डाले भागते हुए
या जेल के सलाखों के पीछे ही सही
जहाँ  एक दिन पहुचना ही है तुम्हें
टटोलना कभी अपने  आपको
तुम इंसान हो क्या ?
समाज हा हा हा
हंसी आती है
हाँ यही समाज हैं न
जो तुम्हें सिखाता है “तुम मर्द हो “
मर्द रोते नहीं है
तुम्हारी हर बात में दम होना चाहिए
हाय रे तुम और तुम्हारा समाज
फूलों पर तेज़ाब डाल दम दिखाते हो
तुम्हें क्या लगा था ?
हम जख्मी चेहरे के साथ गुमनाम कहीं मर जायेंगें
या ख़ुदकुशी कर विदा हो जायेंगे
तो गलत थे तुम
धिक्कार है हम पर अगर ऐसा सोचा भी
अभी तो दिखाना है तुम जैसो  और समाज को आईना
हमारा जख्मी जिस्म तुम्हारे सभ्य समाज का
बदसूरत सोच की तस्वीर है
जब तक तुम्हारी सोच बदलती नहीं है
तब तक अपने जख्मी आत्मा का परचम लहराते रहेंगें
ताकि सनद रहें
जमाना बेवजह सभ्य होने  का दम तो ना भरे !











Monday, 8 December 2014

मेरा पहला एकल कविता संग्रह ............अकुलाहटें मेरे मन की. -अंजुमन प्रकाशन

नई पुस्तक (साहित्य सुलभ संस्करण 2015)
अकुलाहटें मेरे मन की / कविता संग्रह - महिमा श्री / पृष्ठ - 112 / सामान्य मूल्य 120 रुपये / साहित्य सुलभ संस्करण के अंतर्गत मूल्य - 20 रुपये / बाईंडिंग - पेपरबैक / संस्करण - प्रथम, 2015 / आवरण चित्र - रोहित रुसिया / isbn - 9789383969470 /www.anjumanpublication.com