Monday, 21 December 2015

हृदय परिर्वतन की आस...कितना सही ?

यह सच है कि गौतम बुद्ध, महावीर और गाँधी की धरती पर अमेरिका का कानून नहीं लागू किया जा सकता। यहाँ “पापी से नहीं पाप से घृणा करो” का संदेश दिया गया है ।क्षमा दान को सर्वोत्तम दान माना गया है। पर यह क्षमा की याचना अगर अपराधी द्वारा ग्लानी होने के बाद की गई हो। अंगुलिमाल से लेकर चंबल के डाकूओं तक के हृदय परिवर्तन का इतिहास रहा है । ध्यान रहे ! अंगुलिमाल या चंबल के डाकूओं पर बलात्कार जैसे घिनौने अपराध का कभी भी इल्जाम नहीं था । चंबल के डाकू कमजोर और निहत्थो को अपना शिकार नहीं बनाते थे । महिलाओं और बच्चे को भी कभी नहीं सताते थे। वे तो अपने आपको डाकू कहलाना भी नहीं पसंद करते थे । समाज में फैले असमानता और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद कर अपने आपको बागी कहलाना पसंद करते थे।
वर्तमान में एक अपराधी से जिसने बलात्कार जैसे अकल्पनीय जघन्यतम और क्रुरतम हिंसा को अंजाम दिया है । क्या उससे हृदय परिवर्तन की उम्मीद करना सही है?क्या वह अपने अपराध करने की पीड़ा से दग्ध हो कर स्वंय ग्लानी की आग में जल रहा है। कानून के हिसाब से चुकि वो नाबालिग है इसलिए सिर्फ तीन साल के लिए सुधार गृह में रखने की सजा क्या काफी है? सनद रहे ! नाबालिग ने गरीबी से लाचार हो कर कोई चोरी या डकैती जैसा अपराध नहीं किया है । उसने पहले बलात्कार फिर बर्बरता से हत्या किया है।ऐसा अपराध जो सभ्य समाज के मुँह पर तमाचा है। यह बेहद दुखद , संवेदनशील और सोचनीय मुद्दा है। जिस तरह से नाबालिगो द्वारा ढ़ाई साल की बच्ची से लेकर निर्भया जैसी स्वावंलम्बी युवती के साथ बेहिचक जघन्य अपराध को अंजाम दिया जा रहा है । उस अपराध के लिए नाबालिग होने की वजह से सिर्फ तीन साल के लिए सजा किसी को मंजूर नहीं है। आज समय आ गया है कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन किया जाए । बलात्कार और हत्या जैसे अपराध की सजा को उम्र सीमा से मुक्त कर फाँसी की सजा का प्रावधान किया जाए।
यह भी सच है कि कड़ी सजा समाज में बढ़ते अपराध पर विराम नहीं लगा सकता पर इस तरह के अपराधों पर अंकुश तो लगा ही सकता है । साथ ही समाज में बढ़ते अपराधों के कारण और निवारण की ओर सरकार , समाज और स्वंयसेवी संस्थानो द्वारा व्यापक और मजबूत पहल की जाए।

Tuesday, 25 August 2015

बैठे-ठाले

तन्हाई चीखती है कहीं
पगलाई-सी हवा धमक पड़ती है ।
अंधेरे में भी दरवाजे तक पहुँच कर
बेतहाशा कुंडियाँ खटखटाती है।
अकेला सोया पड़ा इंसान अपने ही भीतर हो रहे शोर से
घबड़ा कर उठ बैठता है ।
मोबाइल में चौंक कर देखता है समय
“रात के ढ़ाई ही तो अभी बजे हैं “ बुदबुदाता है।
सन्नाटा उसकी दशा पर मुस्कुराता है।

उधर दुनिया के कहीं कोने में
भीड़ भूख-प्यास से बेकाबू हो कर सड़को पर नहीं निकलती,
सामूहिक आत्महत्याएं कर रही होती हैं ।
मर्सिया गाने का काम
स्वत: सोशल साईटो के तथाकथित बुद्धिजिवियों के पास है।

कवि मरते हुए गाजा के बच्चों के नाम  कविता लिख
अपनी संजिदगी  दिखाता है ।
वहीं दूसरी ओर जेहादी तकरीर के बाद
एक भीड़ हथियारों से लैस होकर निकल पड़ती हैं
दुनिया को ठिकाने लगाने।

एक गरीब देश में भूकम्प आता है
और खाड़ी देशों में  ताजा गुलाबी गोश्त की आमद तेज हो जाती है।

दिल्ली सत्ता के घंमड में चूर अपने विज्ञापनों में इठलाती है।
हाईकोर्ट अधिकारियों को याद दिलाती हैं
उनके बच्चे को कहाँ पढ़ना चाहिए ।
नेता जी कहते हैं
एक स्त्री से एक ही व्यक्ति बलात्कार कर सकता है ।
देश के चौहदियों पर तैनात जवान रिटायमेंट के बाद
एक सेवा एक पेंशन की लड़ाई में कूद पड़ता है।

हम कई कप चाय पीने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
क्रांति होनी चाहिए !
और फिर टीवी खोल कर बैठ जाते हैं।

Sunday, 9 August 2015

अकुलाहटें मेरे मन की- महिमा श्री- समीक्षा श्री एहतराम इस्लाम

महिमा श्री के लिए कुछ शब्द - श्री एहतराम इस्लाम
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किसी के मन की अकुलाहटें जब शब्दों क माध्यम से कुछ यों अभिव्यक्त हो जाएँ कि वे सुनने वालों का अपने मन में पोषित अकुलाहटों का प्रतिबिम्ब महसूस हों तो समझना चाहिए कि कविता ने जन्म ले लिया है। महिमा श्री की कविताओं में अनेक स्थलों पर ऐसा बोध जगाने में सफल है। महिमा श्री की कविताएँ पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि उनमें केवल उनकी धड़कनों की अनुगूंज है। कवयित्री की कविताओं में प्रयुक्त शब्द हमारे अपने न सही पर उनमें मौजूद अनुभूति हमें अपनी लगती है । महिमा श्री को समाज की विसंगतियां और विषमताएँ व्याकुल करती है। वे अपनी बात कभी दर्शन तो कभी विज्ञान कभी यथार्थ तो कभी आस्था का सहारा लेकर व्यक्त करती है। ये सारे तत्व जहां-जहां कोरी बयान बा़जी के इल़्जाम से दामन छुड़ा पाए है वहां-वहां कविता का चेहरा उजागर हुआ है।
‘‘कर्म कई हैं इस मानव जीवन के मर्म कई’’
‘‘अरे तुम खिलखिलाती भी हो
बन्द करो आँखों में काजल भरना
मत भूलो तुम स्त्री हो।’’
‘‘कहती हूँ देखों तो जरा
कितनी भीड़ है
और फिर मैं भी भीड़ हो जाती हूँ।
एक कवि में जो बे-बाकी होनी चाहिए, वह महिमा श्री के व्यक्तित्व का हिस्सा है। सामान्य स्थितियों में वह कितनी भी सामान्य महिला क्यों न ऩजर आएँ लेकिन लेखनी उठाते ही वह अपने कर्तव्य और अधिकार दोनों के प्रति सजग हो जाती है। महिलाओं के प्रति समाज में सदियों से व्याप्त अन्याय के विरोध में यदि वह प्रत्यक्ष रूप से प्रतिरोध का स्वर नहीं बुलन्द करती तो व्यंग बाण छोड़ने से भी नहीं चूकती। और इस तरह महिला स्वातन्त्र्य के पक्ष में उठने वाली आवाज का हिस्सा बन जाती है। ‘‘तुम स्त्री हो’’ शीर्षक कविता में वह कहती है-
उड़ना चाहती हो
कतर डालों पंखों को अभी के अभी
ओफ़्फ तुम मुस्कराती हो
अरे तुम खिलखिलाती भी हो
बंद करो आंखों में काजल करना
और हिरण सी कुलाचें भर
भँवर संग गुजन करना।
ऐसा नहीं है कि महिमा श्री में उपस्थित कवयित्री स्वयं को व्यग्यं तक ही सीमित रख पाती है। ़जरूरत पड़ने पर वह मुखर विरोध भी करती है। वह पुरुष को चुनौती देने वाली मुद्रा अपनाती है और वह भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ। वह ‘चेतावनी’ शीर्षक कविता में पुरुष सहयात्री को खुले शब्दों में ललकारती ऩजर आती है।
‘‘स्वामित्व के अहंकार से बाहर निकलो
सहचर बनो
नहीं तो हाशिये पे अब तुम होगे
हमारे पाँव जमीं पर हैं
और इरादे म़जबूत सोच लो’’
‘‘सोच लो?’’ कहकर महिमा श्री एक दृढ़ संकल्प रखने वाली महिला का चेहरा उजागर करती है औरत को अबला होने के अभिशाप से छुटकारा पाने का आवाहन करती है। तभी तो वह ऐलान करती और डंके की चोट पर ऐलान करती है -
‘‘मैं बनू ध्रुव तारे सी
नहीं थरथराते जिसके पाँव चाहे कितना भी घनघोर अँधेरा हो ’’ उल्लेखनीय है कि महिमा अपनी तमामतर क्रान्तिकारी सोच और नवता को अंगीकार करने वाले दृष्टिकोण के बावजूद अपनी जड़ों से कटना नहीं चाहतीं। एक कविता ‘परम्परा की थाती’ में मां को सम्बोधित करते हुए कहती है.....
" मां जानती हो
उन दिनों मेरे लिए तुम साक्षात देवी हो जाती हों
परम्परा की ये थाती
मैं भी संभालूगीं एक दिन"
धर्म और संस्कार से नाता तोड़ना ऐसा आसान होता भी नहीं। और फिर रुढ़ियों से मुक्ति पा ले इन्सान तो वह उपनी धार्मिक आस्था के साथ भी नवीन मूल्यों से सामंजस्य स्थापित करने में दिक्कत नहीं महसूस करता। हां कहीं कहीं निराशावाद भी झलकता है उनकी कविताओं में। यह खतरनाक है। स्वभावत: वह निराशावादी होती तो कोई बात नहीं थी लेकिन कभी निराशावादी और कभी आशावादी यह दुहरापन व्यक्तित्व के लिए घातक होता है। ऐसा व्यक्ति सदैव विरोधाभास का शिकार रहता है। स्वयं भी कन्फ्यू़ज होता है और पाठकों को भी कन्फ्यू़ज करता हैं। उदाहरण महिमा की स़फरनामा कविता से प्रस्तुत है। एक ही कविता में वह यह भी कहती है -
‘‘जिन्दगी का हर लम्हा अनमोंल है।
एहसास होना यही सच है।’’ और यह भी कि ‘‘सूरज का उदय के बाद डूबना दिन के बाद रात का अन्त शायद यही सच है।’’ कवयित्री यह कैसे भुला सकती है कि रात बीतने के बाद सूर्य का दुबारा उदित होना अधिक और शाश्वत सत्य है। एक बहुत बड़ा दोष और है महिमा श्री की कविताओं में। वह यह कि उनका रचनाकार भाषा के प्रति असावधानी का रवैया अपनाते समय तनिक भी असहज नहीं होता। अब इसको क्या किया जाए कि भाषा के प्रति संवेदनहीनता के लक्षण अनेक वरिष्ठ और चर्चित रचनाकारों के यहाँ भी ऩजर आते हैं।
 महिमा श्री समझ,  और  संंवेदना के स्तर पर काव्य जगत में नई संमभावनाओं को जन्म देती कवयित्री के रुप में हमारे सामने हैंं..भविष्य में उनसे शिल्प पर थोड़ा देने की आवश्यकता है..भविष्य में इनसे हिन्दी काव्य साहित्य को अनेक अपेक्षाएं हैं.

नोएडा एहतराम इस्लाम) २३-०७-२०१५ ६३५/५४७,अतरसुइया इलाहाबाद-२११००३

Monday, 3 August 2015

किसान प्रकृति के मारे या संवेदहीन व्यवस्था के शिकार





किसान भाईयों की आत्महत्याएं बेहद दुखद और अप्रत्याशित रही हैं और हो रही हैं | पिछले कुछ सालों से शुरु हुआ सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है । सबसे पहले आन्ध्रप्रदेश से ये आंधी उठी फिर महाराष्ट्र अब उत्तर प्रदेश। कल के समाचार पत्रों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाको में 50 किसानों की आत्महत्या की पुष्टि की गई है। ।कर्ज के भार से किसानों की कमर टूट गई और हौसलें पस्त हो गए हैं।रही सही उम्मीद को प्राकृतिक आपदा ने फसलें नष्ट कर तोड़ दी है। पिछले 15-16 सालों में अब तक 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं ।देश भर इस पर चर्चा चलती रही है। “कथादेश” ने तो बकायदा इस पर अपने मई अंक 2012 को “किसान जीवन का यथार्थ: एक फोकस “विशेषांक निकाला था ।जिसमें हर प्रकार के आंकड़े, समस्याएं और समाधान सुझाए गए। मैंने भी उसी दौरान किसान भाईयों की दुर्दशा पर कई कविताएं भी लिखी। पर हम सभी जानते हैं , इस कोरी भावुकता से कुछ नहीं होने वाला ।जब तक राज्य सरकार कोई स्थायी समाधान नहीं निकालती और कृषि को महत्वपूर्ण उधोग नहीं मानती । इनकी दशा-दिशा में कोई आमूल-चूल परिर्वतन नहीं हो सकता। राज्य सरकार क्या करती है , कितना इनका सुध लेती है , वक्त ही बताएगा।
हाल में एक अपने एक आलेख में हृदयनाथ दीक्षित का कहना है कि यहाँ निर्वाचन आयोग , विधि आयोग, वित्त आयोग, आदि –इत्यादि आयोग हैं। कृषि प्रधान देश में कृषि आयोग क्यों नहीं है ?
इस आयोग में कृषि वैज्ञानिक , कृषि मूल्य आयोग के वरिष्ठ जन , कुछेक किसान , प्राकृतिक आपदाओं के अध्येता , खाद , बीज आदि के व्यवसाय से जुड़े विशिष्टजन , खाद्य निगम के अधिकारी और ऐसे ही अन्य महानुभाव हो सकते हैं। कृषि विज्ञानी स्वामीनाथन की सिफारिशों को भी जोड़ा जा सकता है। आयोग को कृषि क्षेत्र के समग्र समस्याओं पर विचार का काम सौंपा जा सकता है। कृषि पर तत्काल गहन विर्मश की जरुरत है। “
2012 में मैंनें भी किसान भाईयों पर उस दौरान 3-4 कविताएे लिखी थी... फिर से श्रद्धान्जलि स्वरुप
मैं किसान हूँ
मैं बोता हूँ गन्ने , चावल , आलू,सब्जियां और ना जाने कितनी फसलें
खोदता हूँ मिटटी,जोतता हूँ खेत
प्यार से बोता हूँ , रोपता हूँ
देता हूँ स्नेह
रोज ताकता हूँ
इंच दर इंच बढ़ना
और नाच उठता हूँ ,बढ़ता देख
गाता हूँ ख़ुशी के गीत
रात भर जगता हूँ
करता हूँ पहरेदारी
कोई देना उसे तकलीफ
उखाड़ ना दें कोई उसे जड़ो से
पर मिलता हैं उसके बदले
मुठ्ठी भर रूपये, गरीबी , जहालत
लेनदारो का कर्ज ,पत्नी की आँखों में दर्द
बच्चो का भूखे बिलबिलाना
बैंलो का चारे बिना तड़प तड़प के मर जाना
क्योंकि बोरी भर फसलें मेरी
बिक जाती हैं मिटटी के मोल
ठगा सा मैं खड़ा देखता हूँ आकाश को
जेठ की धूप क्या जलाएगी
अब तो तिल-तिल मर रहा हूँ
गले में कसी कर्ज की हुक से …. मई 2012