Tuesday, 25 August 2015

बैठे-ठाले

तन्हाई चीखती है कहीं
पगलाई-सी हवा धमक पड़ती है ।
अंधेरे में भी दरवाजे तक पहुँच कर
बेतहाशा कुंडियाँ खटखटाती है।
अकेला सोया पड़ा इंसान अपने ही भीतर हो रहे शोर से
घबड़ा कर उठ बैठता है ।
मोबाइल में चौंक कर देखता है समय
“रात के ढ़ाई ही तो अभी बजे हैं “ बुदबुदाता है।
सन्नाटा उसकी दशा पर मुस्कुराता है।

उधर दुनिया के कहीं कोने में
भीड़ भूख-प्यास से बेकाबू हो कर सड़को पर नहीं निकलती,
सामूहिक आत्महत्याएं कर रही होती हैं ।
मर्सिया गाने का काम
स्वत: सोशल साईटो के तथाकथित बुद्धिजिवियों के पास है।

कवि मरते हुए गाजा के बच्चों के नाम  कविता लिख
अपनी संजिदगी  दिखाता है ।
वहीं दूसरी ओर जेहादी तकरीर के बाद
एक भीड़ हथियारों से लैस होकर निकल पड़ती हैं
दुनिया को ठिकाने लगाने।

एक गरीब देश में भूकम्प आता है
और खाड़ी देशों में  ताजा गुलाबी गोश्त की आमद तेज हो जाती है।

दिल्ली सत्ता के घंमड में चूर अपने विज्ञापनों में इठलाती है।
हाईकोर्ट अधिकारियों को याद दिलाती हैं
उनके बच्चे को कहाँ पढ़ना चाहिए ।
नेता जी कहते हैं
एक स्त्री से एक ही व्यक्ति बलात्कार कर सकता है ।
देश के चौहदियों पर तैनात जवान रिटायमेंट के बाद
एक सेवा एक पेंशन की लड़ाई में कूद पड़ता है।

हम कई कप चाय पीने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
क्रांति होनी चाहिए !
और फिर टीवी खोल कर बैठ जाते हैं।

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