Sunday, 26 June 2016

मेरा नजरीया- श्री दिलबागसिंह विर्क

आशा, निराशा, अविश्वास और विरोध की बात करता संग्रह
कविता-संग्रह – अकुलाहटें मेरे मन की
कवयित्री – महिमा श्री
प्रकाशक – अंजुमन प्रकाशन 
पृष्ठ – 112 ( पेपरबैक )
कीमत – 120/- ( साहित्य सुलभ संस्करण के अंर्तगत 20/- )
समाज में व्याप्त बुराइयाँ, भेद-भाव हर भावुक इंसान को व्याकुल करते हैं | कवयित्री ‘ महिमा श्री ’ भी इसी व्याकुलता को अपने कविता संग्रह “ अकुलाहटें मेरे मन की ” में अभिव्यक्ति करती है | समसामयिक मुद्दों को लेकर भी उनकी कलम चलती है और शाश्वत मुद्दों पर भी |
स्त्री होने के नाते स्त्री वर्ग की समस्याओं को उठाना स्वाभाविक ही है, लेकिन कहीं-कहीं वह पुरुष वर्ग के खिलाफ उग्र रूप भी धारण करती है | तेज़ाब फैंके जाने की घटना पर लिखी कविता ‘ तुम सब ऐसे क्यों हो ? ’ में वह पुरुषों को धिक्कारती है | ऐसे लगता है कि उसे पुरुष जाति के ऊपर विश्वास ही नहीं | हर पुरुष जैसे वहशी हो, तभी तो वह लिखती है –
आदमी की भूख / उम्र नहीं देखती / ना ही देखती है /
देश, धर्म और जात / बस सूंघती है / मादा गंध ( पृ. – 17 )
इसी वहशीपन को देखते हुए वह कहती है –
फंसना नहीं है मुझे / तुम्हारे जाल में
( पृ. – 36 )
वह पुरुष को चेतावनी भी देती है –
स्वामित्व के अहंकार से / बाहर निकलो / सहचर बनो /
सहयात्री बनो / नहीं तो ? हाशिये पे अब / तुम होगे ( पृ. – 38 )
इस धरती पर हो रहे विनाश का कारण वह मनु-पुत्रों को ठहराती हुई उनसे प्रश्न करती है –
अरे ओ श्रेष्ठी / बेचकर धरती की गोद /
कहाँ अब सुख की नींद पाओगे ? ( पृ. – 88 )
उसे पुरुष का न तो देवता होना स्वीकार है, और न ही उसके साथ चलने की ललक है वह तो उसे कहती है –
भरमाओ मत / देवता बनने का स्वांग / बंद करो /
साथ चलना है, चलो / देहरी सिर्फ़ मेरे लिए / हरगिज नही... ( पृ. – 37 )
पुरुष पर अविश्वास तो है ही, साथ ही दहेज, भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं समाज में हो रही हैं | मिथिहास में वह रावण के व्यवहार, अहिल्या की प्रतीक्षा और अग्निपरीक्षा जैसी घटनाओं से व्यथित है, इसीलिए वह कहती है कि कैसे करूं मैं प्रेम ? और अगर वह प्यार करती भी है तो उसे शर्तें मिलती हैं, जो उसे स्वीकार नहीं, इसलिए वह कह उठती है –
अब बचके चलती हूँ हर तूफ़ान से
( पृ. – 105 )
वह न सिर्फ़ प्यार से बचना चाहती है, बल्कि पिता द्वारा वर ढूंढें जाने के भी विरुद्ध है –
खर्च कर लाखों लाते हो / छानबीन कर एक जोड़ी अदद हाथ /
जो बनेगा तुम्हारी बेटी का जीवन रक्षक /
पर क्या होता है सही ये फैसला हर बार
( पृ. – 39 )
वह स्त्री को याद करवाती है –
शोक गीत गाओ / भूल गयी / तुम स्त्री हो ! ( पृ. – 16 )
लड़की की दास्ताँ को दो कविताओं में ब्यान करते हुए, वह लड़की को भी चेताती है –
उत्सव तो / अगले जन्म में नसीब होगा /
या / कई जन्मों के बाद ( पृ. - 87 )
लेकिन वह बदलाव की तरफ इशारा भी करती है –
समझा हमें अभी तक / अबला और ना जाने क्या-क्या /
की हर धारणाएँ तोड़ने की / घड़ी आई है अब ( पृ. – 67 )
वह पिता को आह्वान करते हुए कहती है –
भरो उनमें साहस / दो उनकी उड़ान को दिशा /
राह में मत रोको, मत टोको / बनो मार्गदर्शक /
जब तक नहीं बनेगी साहसी / तब तक कभी भी /
कहीं भी नहीं रहेगी सुरक्षित / समाज में बेटियाँ ( पृ. – 39 )
समाज में पुरुष-स्त्री की दशा ही उसे विद्रोही बनाती है, और वह कह उठती है –
मैं करूंगी प्रतिकार / तुम्हारे समाज से
( पृ. – 77 )
हालांकि उसे यह भी लगता है कि –
परंपरा की ये थाती / मैं भी संभालुंगी एक दिन ( पृ. – 40 )
पुरुष-स्त्री संबंधों से हटकर देखें तो उसे माँ से लगाव है, माँ से जुडी यादें उसे भूलती नहीं | माँ के बारे में वह लिखती है –
तुम्हारी गोद ही मेरा स्वर्ग है माँ /
तुम्हारा स्नेह ही तो मेरी संजीवनी /
माँ तुम हो तभी मैं हूँ ( पृ. – 55 )
माँ का बताया जीवन-दर्शन उसे याद है –
तुमने ही कहा था न माँ / चिड़िया के बच्चे /
जब उड़ना सीख जाते हैं / तो घोंसलों को छोड़ /
लेते हैं ऊँची उड़ान / और दूर निकल जाते हैं ( पृ. – 35 )
शायद इसी दर्शन का प्रभाव है कि वह चुने हुए रास्तों पर चलना नहीं चाहती –
रोको मत मुझे / तुम्हारी मंज़िल नहीं चाहिए /
अपना रास्ता चुन लिया है मैंने / भटकने दो, भटकूँगी /
पर वो भटकन मेरी होगी ( पृ. – 13 )
वह उड़ना-दौड़ना चाहती है, प्रकृति को गोद में समेटना चाहती है, घने जंगलों में खोना चाहती है | वह कहती है कि रोको मत, ठहर नहीं पाऊँगी | वह सागर-सी विशाल, हिमाला-सी ऊँची, चांदनी-सी उज्ज्वल और ध्रुव तारे-सी अटल होना चाहती है |
वह आशावाद और निराशावाद के बीच झूलती है | जीवन में आने वाले अनेक दोराहों से गुजरने की बात करती है | उसका मानना है कि भावुक लोगों को दुनिया वाले उपेक्षा का पात्र समझते हैं, क्योंकि वे वहशीपन की दौड़ में शामिल नहीं होते | ज़िन्दगी को समझना चाहती है, तो नतीजा ढाक के तीन पात मिलता है | निराशा जब हावी होती है तो –
जीवन रीता-सा लगता है / सब रंग फीका लगता है ( पृ. – 97 )
भीतर खालीपन दिखता है –
बतकही कितनी भी कर लूं /
रहता है खाली खाली अन्तस का कोना ( पृ. – 31 )
इसी निराशा के कारण वह खुद को अपने भीतर समेट लेती है –
मैंने कहीं भी नहीं खुले रखे हैं दरवाजे /
डाल रखे हैं दरवाजों पे बड़े-बड़े ताले / ( पृ. – 29 )
निराशा के कारण वह विनाश चाहती है, लेकिन इस निराशा में भी नव सृजन की आशा निहित है –
सब खत्म हो जाने दो / तभी शायद शुरू होगा /
सृजन का नया दौर ( पृ. – 106 )
आशावाद की और भी बहुत-सी झलकियाँ इस संग्रह में मिलती हैं | अँधेरा तो क्षणभंगुर है –
सूरज को तो आना है प्रतिदिन /
घनघोर अँधेरा तो मेहमान है / कुछ पल का ( पृ. – 23 )
वह दृढ़ता पर से चलने की पक्षधर है –
अँधेरा घना है तो क्या / रास्ते बंद हैं तो क्या /
चल पड़ो दृढ़ता के साथ ( पृ. – 96 )
वह हिम्मत न हारने का संदेश देती है –
ईश्वर ने तुम्हें गर / नर्क दिया है तो / स्वर्ग का रास्ता भी /
कहीं खुला रखा होगा / बस / हिम्मत मत हारना ( पृ. – 50 )
वह नियति को चुनौती देती है –
इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा / उसी पल तू हर जाएगी ( पृ. – 52 )
आशा-निराशा के अतिरिक्त वह जीवन की नश्वरता में विश्वास रखती है –
सूरज का उदय के बाद डूबना / दिन के बाद रात का आना /
शायद यही सच है ( पृ. – 61 )
लेकिन इस सच से घबराना कैसा –
है अंत सभी का एक दिन / तो फिर घबराना कैसा ( पृ. – 23 )
इस सच को जानते हुए वह जीवन के हर पल में स्वीकृति को महत्त्व देते हुए यह संदेश देती है –
बाँहें फैलाकर स्वीकार कर लो / जिसे व्यर्थ समझ ठुकराया था अब तक /
क्योंकि तभी आसां हो पाएगी / मृत्यु के इन्तजार की अवधि ( पृ. – 32 )
और इसी स्वीकृति का परिणाम उसकी यह जीवन शैली है –
ज़िन्दगी / कभी नदी-सी / कभी टुकड़ों की
जैसे भी पाया / बस जी डाला ( पृ. – 33 )
वह आदमी की त्रासदी से परिचित है –
मगर वो नहीं जानता कि / मृगमारीचिका की इस स्थिति में /
उसे सिर्फ़ रेत ही मिलेगी / और शायद हर आदमी की /
यही त्रासदी है ( पृ. – 26 )
उसे कल्पना पर अविश्वास है –
आकाश में तारे गिनने / या दिन में सपने देखने से /
होता नहीं कुछ हासिल ( पृ. – 75 )
हालांकि वह इसके दूसरे पहलू को भी देखती है – कल्पना के पर लग जाना ही / मनुष्य की सुखद स्मृतियों का /
पहला अहसास है ( पृ. – 26 )
कवयित्री भारतीय सभ्यता और संस्कृति का गुणगान करती है | सैनिकों के लिए दुआएं मांगती है | बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य करती है | उसे लगता है सद्दाम और गांधी महत्त्वकांक्षाओं का परिणाम होते हैं | जीवन में क्या-क्या असरदार है, इसका वर्णन करती है, लेकिन वे असरदार क्यों हैं, यह नहीं बताती | उसे लगता है मृत्यु शैय्या पर लेटे आदमी के सपने छूटने लगते हैं | साथी के मौन पर दीवारें, दरवाजे मुखर हो उठते हैं | लौटना उसे मुमकिन नहीं लगता | बीतने भर से बात नहीं बीत जाती, क्योंकि बीते कल का हिसाब होता है, लेकिन साथ ही वह यह भी कहती है, कि समय के हर पल का हिसाब नहीं होता | समय भले आगे चलता है, लेकिन मन आगे भी चलता है तो पीछे भी | उसे लगता है कि सुख हवा के झोंके की भांति सरसरा कर निकल जाता है | वह चीजों को दूर नहीं पास देखने में विश्वास रखती है –
कहीं दूर भटकने से बेहतर है / अपने पास ही ढूंढें
वहीं कहीं हमारी जमीन मौजूद है ( पृ. – 68 )
वह अपने गाँव को याद करती है, किसानों की दुर्दशा का चित्रण करती है | सावन ऋतु का वर्णन करती है, सावन की बारिश में गरीबों की दशा को देखती है | दंगों के बाद आदमी की दुविधा का वर्णन करती है | लन्दन में गायों के कत्लेआम पर कृष्ण को पुकारती है | परेशान ज़िन्दगी से बचाने के लिए कोई तो आए, इसका निवेदन करती है | चाँद-चांदनी के माध्यम से संदेश देती है –
एक दूसरे के बिना / नहीं चलता यह संसार ( पृ. – 84 )
पानी का महत्त्व दर्शाते हुए लिखती है –
जल बिन मछली मर जाए / औ बिन जल सब मछली बन जाएँ ( पृ. – 89)
वह नकाब रहित होने के पक्ष में है –
दुनिया गर नाटक है तो / हम कब तक रहेंगे एक्टर
कभी तो आने दो हमको / जो हैं हम / हम बन कर.... ( पृ. – 44 )
कविता में महत्त्व भाव का होता है या शिल्प का, इस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता | कवयित्री की नजर में कविता क्या है, इसे वह बड़े सुंदर ढंग से कहती है –
कविता कुछ इधर-उधर से / जोड़े गए शब्दों का /
जमघट नहीं होता / बल्कि उसमें होता है /
अनछुआ दर्द / एक ख़ामोशी, एक अहसास ( पृ. – 70 )
भले ही कवयित्री शब्दों से ज्यादा महत्व अहसास को देती है , लेकिन इस संग्रह में शब्दों की कलात्मक पेशकारी हुई है | कवयित्री ने पद मैत्री, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का भरपूर प्रयोग किया है | विरोधी शब्द युग्म की भी भरमार है, लेकिन इससे कविता की सुन्दरता में बाधा नहीं पहुंचती, अपितु सौन्दर्य बढ़ता ही है | कवयित्री की शैली वर्णनात्मक है, लेकिन अनेक दृश्य भी आँखों के सामने उभरते हैं | संबोधनात्मक शैली का भी भरपूर प्रयोग हुआ है | छंद मुक्त है, लेकिन तुकांत के अनेक उदाहरण मिलते हैं |
संक्षेप में, यह संग्रह कवयित्री की आकुलता को भी ब्यान करता है और उसके उग्र तेवरों को भी | भाव पक्ष और शिल्प पक्ष दोनों दृष्टि से अनेक संभावनाएं जगाता है |

दिलबागसिंह विर्क
95415-21947ो

नई ग़जल... आदमी ग्लोबल हुआ


Friday, 27 May 2016

प्रेम में होना मतलब इंतजार में होना




प्रेम में होना मतलब इंतजार में होना है।
या फिर यूँ ही खाली सा मन लिए
अक्सर गुम हो जाना।


प्रेम को तिलस्मि की आदत जो है
पर्दा हटते ही
जादू खोने लगता है।

कहना कुछ होता है
कहते कुछ और ही है।
समझना होता कुछ और
समझते कुछ और ही है

मैं हँसता है तुम पर
तुम कोसती है मैं को
हम मिले ही क्यों?

मैं कहता है वो तुम नहीं जो मेरे ख्वाव में थी
मेरी तलाश कोई और है।

तुम कहती है
फिर भी एक कोशिश करते हैं।
चलो साथ चल के देखते  हैं।




Saturday, 21 May 2016

पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएं





हम पढ़ेगें-हम बढ़ेगें- औरत के हक में ,गाँधी प्रतिष्ठान 27 फरवरी 2015, नई दिल्ली



मुझे संस्मरण सुनाने के लिए निमंत्रित किया गया था । समय 5 मिनट दिया गया था क्योंकि वक्ता बहुत थे। मैंने अपने जीवन में आए एक दलित महिला की जिजीविषा और एक सफाईकर्मी से बैंक के क्लर्क तक पहुँचने की अनोखी दास्तां सुनाई। यह संस्मरण मेरे जीवन की अमुल्य निधि की तरह है। मैंने उस स्त्री के हाथ में पखाने साफ करने के साजों -समान के बाद बैंक की कुर्सी पर बैठ के फाइलों को पढ़ते और सजाते देखा है।  वो आज भी सप्ताह में एक -दो बार मिल जाती है और मैं खुशी से फुले नहीं समाती । समय कम था और संस्मरण बहुत लम्बा अत: बहुत जल्दी-जल्दी बोलना पर रहा था ताकि उस स्त्री के संर्घष की सारी बात भी हो जाए और दिए गए समय में ही कर सकूं।

पूरा संस्मरण इत्मिनान से किसी दिन अपडेट कर दूँगी। अभी कागज पर उतारा नहीं है।
इस विडियों को एक मित्र ने सरप्राइज की तरह मुझे मेल कर गिफ्ट किया मुझे तनिक  भी  ये भान नहीं था कि  पूरे संस्मरण का वो विडियों बना रहा था अपने मोबाईल से । सच तो यह है, वे मेरे मित्र भी नहीं है बल्कि मेरी महिला मित्र के साथी हैं और उस वक्त मैं उनको जानती भी नहीं थी।उनका बहुत-बहुत आभार ।

बिजली के सामने ढिबरी की क्या औकात...


बिजली के सामने ढिबरी कौन जलाए .?... तिसपर विडंबना यह कि दिल्ली में भी अब बिजली घंटो गायब रहने लगी है।.खैर! इसका फायदा यह हुआ कि बचपन के दिन याद आ गए।प्रतिदिन 3-4घंटे शाम को बिजली गायब होती । हम लालटेन और लैम्प की रौशनी में बैठ के पढ़ते। याद है रोज शाम होने से पहले उसकी साफ सफाई कर के रख दी जाती थी।पूजा घर में शाम की दीया- बाती के बाद दीए की टिमटिमाती रौशनी में माँ का संंध्या -वंदन चलता और वो कमरा अर्पूव शांति और अलौकिकता की रहस्मयी वातावरण से आलोकित हो जाता । अगर होमवर्क बनाने की जरुरत नहीं होती या पिताजी शहर से बाहर होते और नानी जी हमारे यहाँ आई होती तो लालटेन की लौ धीमी कर हम उनसे रोज शाम को कहानियाँ सुनने की फरमाइश करते हुए उन्हें घेर कर बैठ जाते और सोने से पहले तक सुनते रहते।बिजली की 24घंटे की आमद से सुविधाएं तो बढ गई.हम नित नई चीजों में व्यस्त हो गए. पर खुद से साक्षात्कार करने के अलौकिक एकांत और कल्पना की प्रकृति से दूर हो गए।



टिमटिमाती रौशनी स्याह अंधेरे में

उजास का एहसास देती 

अपनो के साथ जिन्दगी की मिठास देती 

दीए की मध्यम लौ में

रास्ते साफ और मंजिल पास होती 

हवाएं मल्हार गाती , 

जुगनू हथेलियों में बंद कर धीरे से खोलते ही

   आंखें  सपनों से भर जाती

हम  परियों के देश में विचरने लगते

  झिंगुर साथ में गुनगुनाते 

दूर पेड़ो से कोयल भी कुक कर साथ देती

पत्तों की सरसराहट कल्पनाओं के द्वार खोलती

दीदी को दूर से घोड़े की टाप सुनाई देती

भईया को भुत आता दिखाई देता

किस्से-कहानियों का संसार

दिये की लौ में हजार बार नई दुनिया दिखती

जादूगर, राजकुमार, बौने, शेर, भालु

सब आस-पास होते
बिजली के आते ही सब गायब 
उफ्फ! बहुत समय बर्बाद हुआ 
चलो! अब अपनी पढ़ाई करो
पिताजी का आदेश सुनाई देता
हम्म कौन कहता है  ?
बिजली उजालों की देवी, प्रगति की खान है
 आँखों में चकाचौंध और जीवन में तूफान लाती है
हम तेज रफ्तार से चलते-चलते 
यकायक उड़ने लगते हैं
उडते-उड़ते  कहीं खो जाते हैं ।
ढूढ़ना हमें जब तुम्हें कहीं दबा हुआ वो दीया मिले
जिसे माँ-नानी ने गंगा में प्रार्थना के साथ
हमें याद करते हुए बहाया था
उसे हाथों में लेकर नीम अंधेरे में जलाना
फिर धीरे से हमारा नाम लेकर बुलाना
यकीनन हम वापस आएगें
फिर से अपने आपको पाएगें

May 02, 2016 7:41pm

Friday, 20 May 2016

कैसे करुँ मैं प्रेम....

बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम  ?
रोज ललनाएं मारी जाती हैं गर्भ में
कहीं चढ़ जाती हैं दहेज की वेदी पर
कभी छली जाती हैं प्रेमपाश में
या फिर रखी जाती हैं कई लक्ष्मण रेखाओं के घेरे में
और पाती हैं कई हिदायतें

रावण आयेगा, बलात ले जाएगा
बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम
धधकता है हृदय क्रोध से
जलता है मन आवेश से

कैसे उगाऊँ दिल में कोमल एहसासों के बीज
जहाँ सीता हर रोज अग्नि-परीक्षा  देती है
अहिल्या पथरायी प्रतीक्षारत है न्याय के लिए
जहाँ एक ना पर तेजाब से
झुलसा दिये जाते हैं सारे अरमान

बताओ तो भला कैसे करु मैं प्रेम ?

पटियाला-शांत शहर और दिलवाले लोग (यात्रा वृतांत-१), 30 sept 2014

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री ऋषि प्रभाकर जी के मंगल विवाह में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ | 25 सितम्बर 2014 की शाम को लेडीज संगीत के आयोजन में शामिल होना तय था | हमारी ट्रेन दिल्ली से राजपुरा तक थी वहाँ से हमने  बस पटियाला तक की ली फिर पंजाबी यूनिवर्सिटी बस स्टैंड पर हमें प्यारे से रोबिन और मनु जी लेने आ गए | इस बीच में लगातार प्रभाकर सर, आ. गणेश जी बागी से दिशा निर्देश मिलता रहा |
आ. योगराज सर के नए नवेले, शहर से दूर, खेतों और हरियाली के बीच स्थित हवादार बंगले में पारम्परिक तरीके से स्वागत हुआ | दरवाजे पर आ. रवि प्रभाकर जी और आदरणीया श्रीमती योगराज प्रभाकर जी ने स्वागत किया | दरवाजे के दोनों कोनों पर सरसों के तेल की कुछ बूँदें गिराई गयीं, फिर गुलाब जामुन से मुहं मीठा कराया गया | घर दुल्हन की तरह सजा था हम रात को ८ बजे के करीब पहुँचे थे अतः संगीत समारोह की तैयारी हो चुकी थी और मेहमानों के आने क्रम चल रहा था | वातावरण में पंजाबी गानों का समा बंधा हुआ था | घर के अंदर प्रवेश करने के बाद हमें सभी बड़े –छोटे सदस्यों  से मिलवाया गया | सभी  बड़े ही प्यार और गर्मजोशी से मिले |
हमसे पहले दोपहर में आ. सौरभ पाण्डेय जी और आ. गणेश बागी जी पहुँच चुके थे | पहले हम योगराज सर का बंगला घूमे जो कि बहुत ही हवादार है और आंतरिक साज-सज्जा अभी चल रही है । आदरणीय सर ने हमें सजावट के लिए लायी गयी शानदार पेंटिंग्स दिखाईं जो उनकी कलात्मक रूचि को बखूबी परिलक्षित कर रही थीं |
आदरणीय सौरभ जी ऊपर के कमरे में रुके है हमें बताया गया | हम यानी कि मैं और गीतिका वेदिका | दिल्ली से हम साथ आये थे पटियाला | हम ऊपर कमरे में उनसे मिलने गए | वे अकेले बैठे थे । आ. प्रभाकर सर और  आ. बागी जी शादी के कुछ कार्य से गए हुए थे | वहीं पर हमारे लिए सगुन के गुलगुले और कई तरह के नमकीन आ गए, साथ में चाय भी | आ.सौरभ जी ने चुटकी ली "ये लो आ गया सगुन का गुलगुला" .."गुड खाए और गुलगुले से परहेज" उन्होंने गुलगुले को देख प्रचलित मुहावरे को उदधृत किया | हम सबके चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी और कुछ देर तक गुलगुले महाराज ही छाए रहें | मैं मन ही मन में सोच रही थी कमाल है ! गुलगुला महाराज तो पंजाब में भी धाक जमाये हैं | पिताजी की कही बातें  याद आ रही थी उन्होंने  बचपन में बताया  था गुलगुला प्राचीन वैदिक काल से प्रचलन में है और ये मिष्ठान उसी समय से हमारे यहाँ पूजा–पाठ में,यज्ञ की आहुति में डालने के लिए बनता चला आ रहा है | आज भी माँ रामनवमी के दिन पूजा में चढाने के लिए बनाती  हैं | और नवरात्रि में नवमी के दिन पूरी और गुलगुले भी हवन में डाले जाते हैं और प्रसाद के रूप में हमारे घर में खाए जाते है और बाटें जाते हैं | गुलगुला बनाना जितना आसान है और खाना उतना ही स्वादिष्ट बशर्ते उसे सिर्फ गुड में बनाया जाए और शुद्ध देशी घी में तला जाए|

गुलगुला प्रकरण तक बागी जी और आ. प्रभाकर सर आ चुके थे और हमें देख कर बहुत ही प्रसन्न हुए और हमे गले लगाया | आ. प्रभाकर सर हमें कभी भी पैर नहीं छूने देते, वे हमेशा कहते हमारे यहाँ लड़कियाँ पैर नहीं छूतीं और सभी गले लगाते हैं | अपने देश में हर शहर की अपनी बोली, अपनी भाषा और अपना चेहरा है और जुदा होता हुए भी अपना सा है । सबमें  कुछ न कुछ समानता है कई भिन्नताओं के बाद भी जैसे गुलगुला | पैर न छूनेवाली बात पर हम सभी (आ. सौरभ जी, आ. बागी जी, मैं) अपनी पूर्वी आचार–विचार की बात करने लग गए कि बिहार और यू.पी में बड़ो के पैर छूना कितना अनिवार्य है, चाहे लड़का हो या लड़की | इसी बीच में आ. गीतिका जी ने आ.सौरभ जी से पूछा कि व्यंजना, लक्षणा और अभिधा में क्या अंतर है ? पहले तो उन्होंने कहा कि ’चार दिनों के लिए कोई पढाई नहीं’ । फिर गीतिका के बार–बार अनुरोध पर उन्होंने इनके बारे में सोदाहरण बताया |
तरह-तरह के बातों के बीच ढेर सारी प्यारी -२ बच्चियाँ आ गयी और उन्होंने हमें संगीत में शामिल होने के लिए जल्दी से तैयार होने को कहा ।  उनके साथ  डांस करने के लिए निमंत्रित भी किया । इसी बीच आ. राणा प्रताप जी का भी पटियाला आगमन हो गया | हम तैयार होकर नीचे आ गए । रात के साढ़े नौ बज चुके थे | बड़े कमरे में रस्म चल रहा था जहाँ थोड़ी देर रुकने के बाद, हम सब सीधे संगीत स्थल पर पहुचें | यहाँ विभिन्न प्रकार के स्नैक्स चलाये जा रहे थे । हमने भी गोल्पप्पे और पाव-भाजी का आनंद उठाया | प्यारी बच्चियाँ हमारे साथ लगी हुयी थीं | इस बीच में हमें आशीर्वाद के तौर पर लिफाफा आ. सौरभ जी द्वारा मिला जो आ. प्रभाकर सर ने दिया था |
पंडाल अभी खाली था । डीजे का संगीत चल रहा था । सबसे छोटी सुंदर सी सोनल ने कई गानों पर एक से बढ़ कर एक नृत्य किये । हर बीट पर उसकी थिरकन और उस के संतुलित भाव भंगिमा ने सब का दिल जीत लिया | कहीं से लगता ही नहीं था की इसने भली-भाँति डांस नहीं सीखा है | इस बच्ची में संगीत को समझने की प्रतिभा जन्मजात है | उसके सारे डांस स्टेप्स इतने सधे हुए थे कि लग रह था की वो पूर्णतया प्रशिक्षित है | इन सबके दौरान रस्म समाप्त हुए और सभी लोग संगीत समरोह के लिए तैयार पंडाल में आ चुके थे । इधर संगीत भी अपने रवानी था । आ. योगराज सर के आते ही माहौल और मस्त हो गया । उन्होंने डांस किया भी और करवाया भी ! आ. सौरभ जी, आ. राणाजी ओर आ. बागी जी और गीतिका को खूब नचवाया | और जब समारोह अपने चरम पर पहुचा तो पटियाला में पंजाबी गीत ट्रैक की जगह पर भोजपुरी बजने लगा । उसके बाद तो फिर क्या कहने थे ! धरती फोड़ डांस हुआ जिसका वर्णन जरा मुश्किल है इसलिए मैंने आपकी कल्पना पर छोड़ दिया जा रहा है |


                        

                       पटियाला से ऊना-हरियाली और रास्ता


                  (दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे – यात्रावृतांत-२ )



संगीत-संध्या में धमाल करते-करते और रात्री-भोजन के सुस्वादु व्यंजनों के दौरान भी एक दूसरे की जम कर खिंचाई हुयी और भोजपुरी गाने के बोल पर ठहाके पर ठहाके लगे | आ. बागी जी, आ. सौरभ जी ने कई भोजपुरी-ठुमके वाले गानों की यादें ताजा कीं | मुझे भी Whatsapp पर छाये कई बिहारी जोक्स याद आये जिसे आ. राणा प्रताप जी पूरे मजमून और तफ्सील के साथ पेश  किया | पटियाला में भी छपरा, आरा, बलिया छाये हुए थे | इन सब के दौरान रात के १२ बज चुके थे |
आ. योगराज सर ने आ.सौरभ जी को बताया उनके लिए विशेष तौर पर होटल में कमरे बुक किये हुए हैं, उन्हें वही आराम करना है और सोना है | आ.सौरभ जी ने कहा इतनी शानदार हवा चल रही है, मैं तो यहीं आपके  निवास–स्थान में ही रहूँगा | पर आ. योगराज जी उन्हें कहा, "नहीं..! आप वहीं जाए, आराम करें, कल सुबह ८ बजे उना के लिए बरात निकल पड़ेगी, जल्दी उठना है, आप होटल में ही जाकर आराम से सोयें, तभी नींद भी सही से पूरी होगी | इसी बीच हमारा भी जिक्र हुआ कि कहाँ ठहराया जाए | हमारे लिए घर और होटल दोनों विकल्प रखे गए थे । पर वेदिका २४ ता. से यात्रा कर रही थी तो हमने आराम से पूरी नींद लेने और सुबह जल्दी तैयार होने के लिए होटल में रुकना सही समझा | इस तरह हम पांच लोग आ. योगराज सर द्वारा खास हमारे लिए प्रबंध किये गए जायलो में अपने साजो सामान के साथ होटल के लिए निकल पड़े | और १० मिनट में होटल आशियाना पहुँच गए | रात के करीब १ से  २ के बीच में हमारी आँख लग गयी | सुबह ६ बजे के करीब हम जाग चुके थे और फटाफट तैयार  हो गए | ७ बजे के करीब हमें चाय पीने की इच्छा हुयी | पता चला बाकी लोग चाय पीने पास ही कहीं गए हुए हैं | वेदिका ने आ. सौरभ जी को फोन मिलाया तो वो हमारे लिए तुरंत मठरी साथ में ले के आ गए | पर हमें तो चाय पीनी थी, दुबारा हमने सौरभ जी को परेशान किया और फिर हम तीनों चाय पीने बाहर गए | चाय पीने के दौरान सौरभ जी ने बताया कि पंजाब में लोग खालिश दूध की कम चाय-पत्ती और ढेर सारी चीनी वाली मीठी, कम उबली हुयी चाय पीते हैं | यहाँ कड़क चाय नहीं मिलेगी | और चाय वाले भैया को उन्होंने पहले ही निर्देश दे दिया, चीनी कम डालना और जरा ज्यादा उबालना | इसी बीच मुझे दरवाजे पे कुछ पंजाबी में लिखा हुआ दिखा, मैंने पूछा तो आ. सौरभ जी कहा लिखा है, "७ रूपये की चाय" | साथ में सवाल दाग दिया, "बताओ इसे कौन सी लिपि कहते है ?"  मुझे सिर्फ गुरु ही याद आ रहा था इसलिए मैंने बिना सोचे फटाक से गुरुवाणी बोल दिया, तो उन्होंने बताया 50% पास हुयी हो, इसे गुरुमुखी लिपि कहते हैं |
सुबह के ८ बज चुके थे | बारात में शामिल होने के लिए जायलो होटल के बाहर आकर खडी हो चुकी थी | हम अपने बारात में पहने जाने वाले कपड़ो के साथ सवार हो गए | उधर पूरी बारात योगराज सर के निवास–स्थान से भी निकल चुकी थी | सौरभ जी और बागी जी उनसे फोन पर संपर्क बनाये हुए थे |
बारात पटियाला से उना जा रही थी | १५६ किलोमीटर की दुरी हमें तय करनी थी, जो २:३० से ३ घंटे में पूरी होनी थी | हमारा सफ़र शुरू हो चुका था | आ. सौरभ जी ड्राईवर भइया से परिचय ले रहे थे | उसने अपने दो नाम बताये । पर मुझे उनका प्यार से पुकारे जानेवाला  नाम याद रह गया  है, “ लवली  सिंह “ । उन्होंने गाडी में पंजाबी गाने चला रखे थे | हम भी उसका आनंद उठा रहे थे | पंजाब का अपना ही सौन्दर्य है, लहलहाते खेत, खुबसूरत बाँध और शांत प्रसन्नचित जन समुदाय | इतना शांत शहर मैंने कभी नहीं देखा था | जैसा मैंने पटियाला को महसूस किया | किसी को कोई जल्दी नहीं, चेहरे पर कोई तनाव नहीं | महानगर में रहनेवाले और तनावयुक्त जीवन जीने वाले हम जैसे लोगों के लिए आश्चर्यजनक बात थी | हम अभी पंजाब में थे और हरियाली के बीच हर २ से ३ किलोमीटर पर सफ़ेद खुबसूरत वास्तुकारी से निर्मित गुरुद्वारा दिख जाता | और साथ में स्वच्छ क़लकल बहता आँखों को सुकून देता बहता बाधों का पानी | दो तरफ़ा रास्ते  के बीच भी चंपा, चमेली, गुलाब, गुड़हल और न जाने कितने खुबसूरत पौधे लगे थे, जो रास्ते को और भी रमणीय बना  रहे थे | जिनके नाम  आ. सौरभ जी बताते जा रहे थे तो कभी बागी जी | खेतों में धान लगा हुआ था जिनमे बालियाँ आ चुकी थी | आ. राणा जी की तबियत खराब थी जैसा कि उन्होंने बताया तो वो चुप से थे, पर हम चारों पूरी मस्ती कर रहे थे | हाँ, एक बार राणा जी ने लवली जी से डिमांड किया कि गुरुदास मान के गाने चलाओ | लवली  जी ने किस पंजाबी गायक के गाने चला रखे थे पता नहीं, पर धुन तो बस थिरकने  वाली थी | एक बात मैंने नोटिस की पंजाब में कहीं भी हनुमान जी का मंदिर नहीं था | सिर्फ गुरूद्वारे थे | इस बात को मैंने कहा भी | हमारे यहाँ तो हनुमान जी को ट्रैफिक पुलिस बना के रखा हुआ है, या फिर जमीन हथियानेवाला दादा बना रखा है | दूसरे शहरों में हर मोड़ पर हनुमान जी दिख जायेंगे या फिर कोई मज़ार | और इन्हें किस लिए खड़ा किया जाता है आप सबको खूब पता है |
हम पटियाला से आगे निकल कर सरहिंद पहुँच गए थे | वहाँ से हमें रूपनगर फिर आनंदपुर साहिब फिर नंगल और तब उना पहुँचना था | ऐसा हमें लवली जी ने बताया कि आनंदपुर साहिब आ गया | आनंदपुर का नाम सुनते ही आ. सौरभ जी ने कहा गुरुद्वारा मुझे देखना है | इंदिरा गाँधी और भिंडरवाला के बीच इसी गुरुद्वारे में राजनैतिक समझौता हुआ था | इस गुरुद्वारे का धर्मिक महत्व के साथ राजनैतिक महत्त्व भी है | उनका उतावलापन और किसी बच्चे जैसी उत्सुकता देख कर लवली सिंह ने सलाह दी, "सर जी, रात को लौटते वक्त देख लेना अभी बहुत देर हो जायेगी, बारात में समय पर पहुँचना है | और ये तो २४ घंटे खुला रहता है, कोई परेशानी  नहीं है |"
इस तरह रात को वापस लौटने के दौरान आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा दर्शन का कार्यक्रम तय हो गया | रास्ते में हमें गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब मिला था | सबका विचार हुआ यहाँ चल कर माथा टेक के आना चाहिए | इसका कारण था गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब का हृदय दहला देनेवाला इतिहास | सरहिंद ऐतिहासिक और धार्मिंक दृष्टि से बहुत महत्‍वपूर्ण है | आ. सौरभ जी ने बताया यहीं मुगलों ने गुरु गोविन्द सिंह जी के दोनों पुत्रों को, जिनमें एक सात साल तथा दूसरे ९ साल के थे,  जिन्दा दीवार में चुनवा के उनके सर को खास तरह चक्र से क्षत-विक्षत कर दिया गया था | उनका शहीदी दिवस आज भी यहाँ लोग पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं | सुन कर मन बहुत दुखी हो गया | अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए सिक्खों ने कितना बलिदान दिया है ! पंजाब आकर फिर से सब भान होने लगा | अपना देश हमेशा इनका ऋणी रहेगा | मैं वीरों की धरती के प्रति नतमस्तक थी | हमने अंदर जाकर अपनी मौन श्रद्धांजली दी और वापस आ गए |

हम ८ बजे के निकले हुए थे बारात वाली बस अभी हमें मिली नहीं थी | किसी ढाबे पर एक साथ होने की बात हुयी थी पर शायद हम लेट हो गए थे और दोपहर के १ बजने वाले थे | एक ढाबा देख कर गाड़ी रोकी गयी | हमने वहाँ प्याज के पराठे, सब्जी, दही खायी और चाय पी | चाय कच्ची थी जिसे सौरभ जी नहीं पी पाए और अपनी चाय बागी जी के ग्लास में उड़ेल दिया | आ. बागी जी ने चुटकी ली, "लगता है भेड़ के दूध की चाय बनाके लाया है | वैसा ही स्वाद आ रहा है |" हम सब हँसने लगे | राणा जी का मौन अभी तक के सफ़र में जारी था, पर बागी जी की लघुकथा जैसी चुटकियाँ व हाजिरजवाबी गुदगुदा जाती तो सौरभ जी का चीजों के प्रति बच्चों जैसी उत्सुकता और चेहरे पर प्रसन्नता हम सभी में भी उत्साह दुगना कर जाती | हम बात करते रहे रास्तो के बारे में, सतलुज और भाखड़ा-नगंल बांधो के बारे में | लवली जी हमारे लिए ड्राईवर के साथ–साथ गाइड भी बने हुए थे | इस बीच बारात वाली बस मिल गयी जिसमें दुल्हे बने ऋषि प्रभाकर जी के साथ पूरी बारात साथ थी | आनंदपुर साहिब पहुँचने के पहले रास्ते में भव्य गेट दिखा, जो गुरुद्वारा के वास्तु के आधार पर ही सफ़ेद पत्थरों से निर्मित था | इतना खुबसूरत था की बस मैं देखते रह गयी | अपने मोबाइल से कोई फोटो भी नहीं ले पायी | हम नंगल में प्रवेश कर चुके थे हमारी गाडी सतलज नदी पे बने बाँध के पास से गुजर रही थी, बहुत ही मनोरम दृश्य था जिसे मैं सिर्फ अपने आँखों में भर लेना चाह रही थी |
हम उना पहुच गए थे | पंजाब पीछे छूट गया था | अब हम हिमाचल में थे | वातावरण बदल रहा था, हरियाली कम हो रही थी | हम ऊँचाई की ओर बढ़ रहे थे, रास्ते अब चिकने और चौड़े होने के बजाये थोड़े संकरे और पथरीले होने लगे थे और कई मोड़ आने लगे थे | रास्ते में मुझे एक पत्थर पर कुछ लिखा मिला जिसे मैंने जोर से पढ़ा | ये सुन कर सौरभ जी हँस पड़े, कहा, "ये किसी के घर की ओर जाने का संकेत है | साथ में बताने लगे कि हिमाचल के कई सारस्वत बाह्मण दक्षिण भारत में  ६००-७०० साल पहले जाकर बस गए हैं | इसलिए वहाँ ये लोग उनके बीच बहुत ही सुंदर और गोरे-गोरे दीखते हैं, जो यहाँ हिमाचल में भी उतने गोरे नहीं हैं |
बारात वाली बस हमें रुकी दिखाई दी और सारे बाराती भी बस से बाहर आ चुके थे | हमारी भी गाडी रुक गयी, पता चला हम दुल्हन के गाँव ओयल आ गए थे | पास में सजी–धजी घोड़ी खड़ी थी | रस्में चल रही थी | बच्चियाँ जिन्होंने हमें खूब प्यार दिया था और संगीत में जम कर डांस किया और करवाया था, हमें देखते ही सब दौड़ कर आईं और गले मिलीं | उनकी निश्छलता और उनका प्यार मन को कहीं छू गया | पास में वधु का घर था और जयमाला के लिए लगाया का विशाल पंडाल, जहाँ कुर्सियां लगी थीं | खाने-पीने का पूरा इंतजाम | हम थिरकते–ठुमकते वहाँ पहुँच गए | खूब स्वागत–सत्कार हुआ |
पूर्वी राज्यों में जिस प्रकार शादियों में अहमकाना हरकते होती हैं, वैसा कुछ नहीं था | न इधर लड़केवाले ऐंठ रहे थे और न ही लड़की वाले परेशान हो रहे थे कि पता नहीं लड़के वाले क्या डिमांड कर दें और कैसे उसकी पूर्ति होगी | दोनों परिवारों के बीच बहुत ही सौहार्द्रपूर्ण वातावरण बना हुआ था जिसे देख मुझे इतना सुकून मिल रहा था की क्या बताऊँ |
हमें कपडे बदलने थे तो बच्चियों हमें वधु के घर ले के गयी | वहाँ हम तैयार हुए पर हमसे गलती ये हो गयी कि बिना किसी को बताये और पूछे चले गए थे | इस बीच जब हम आये तो जयमाला की रस्म हो चुकी थी | सभी लोग खाना खा रहे थे | फिर पता चला खाना खा कर हमें भी लौट जाना है | रात में रुक कर शादी नहीं देखनी | हमारा चेहरा देखने लायक था | जब हम आये तो हमने खाया | सामान लाने गए | प्यारी सी वधु से कमरे में मिले | वो बहुत सुंदर लग रही थी | हँसने पर गालों पर डिम्पल पड़ रहे थे | आ. प्रभाकर सर जी की बेटी ऋतु ने हमारा उनसे परिचय करवाया | बड़े प्यार और सहजता से मिलीं | हमने बधाई दी और दूसरे कमरे में आ गए जहाँ हमने अपने कपडे रखे थे |  मैंने शादी वाले कपडे बदलकर रास्ते के लिए हलके कपडे वापस पहन लिए | हमसे बेवकूफी हो चुकी थी | जयमाला देख नहीं पाए थे, मन में मलाल रह गया था |
क्रमशः