Monday, 4 January 2016

कछुए सा खोल और चमकीली सीपियाँ



हम सब के पास एक खोल है।
बिल्कुल कछुए की तरह
जो खतरे को भांपते ही समेट लेता अपना अंग-प्रत्यंग ।
सच में पलायन का मतलब भागना होता है।
या नई संभावनाओं की तलाश में खुद को टटोलने के लिए
स्वंय का साथ।
विचारों का आना-जाना तो रोक पाते नहीं
पर बाहरी हलचल पर आँखे मुंद
विचारशील होने का ढ़ोग अवश्य करते हैं।
या खुद की पीठ थपथपा कर विचारों के सीपियों से
मोती ढ़ूढ़ लाने का गाहे-बगाहे दावा ठोकते फिरते हैं।
सच तो यह है कि समय सब देख रहा है।
हमारी कुंद होती बुद्धि के धार को
श्रेष्ठता के खोखले नाकाब को ।
नकली बाजार के हथकंडो के गुलाम ,
आरोप-प्रत्यारोप के कठपुतले हम ।
बात-बात पर हवा में मुठ्ठियाँ लहराने वाले।
नया ना कुछ खोजने, ना करने के काबिल
अपनी खोलो से निकलकर बस झूठे दावे करने का सलीका
जरुर हासिल कर लिया है हमने ।
                                                           30-12-2015 महिमाश्री(2015 का आंकलन करते हुए ..खुद को टटोलते ..)