Saturday, 30 April 2016

भात कहाँ दो जून- मजदूर भाईयों को समर्पित

जीवन अपना हो गया , मजदूरी के नाम
सर पे सूरज तप रहा , झुलस गया है चाम


ले हाथों में फावड़ा , निकली घर से आज

मजदूरी जो मिल गयी , बन जाए सब काज


जीवन मिला पहाड़ सा , गहरा है आघात

दिन भर मजदूरी किया , पानी ही सौगात

मार बुरी है पेट की , भीख नहीं दरकार

पत्थर ढो मजदूरनी , पाल रही परिवार


एक मई घोषित हुआ , बने कई कानून

दशा दिशा सुधरी नहीं ,भात कहाँ दो जून
.                                                            ...महिमाश्री( 2014)



Friday, 8 April 2016

क्यों नहीं करता कोई बातें गुले गुलजार की




महिला दिवस पर..

लड़ते मरते सब यहाँ धर्म जात के नाम
मिट्टी में मिल जायगा बिना मोल का चाम
संघर्षों की जिन्दगी उस पर नारी नाम
बची रहेगी यह धरा तुमने ली गर थाम....महिमाश्री 8-3-2016

फागुन के स्वागत में कुछ दोहे........


सांस सांस में बज उठे वीणा ढोल मृदंग
फागुन के संग झूमे वसुधा का हर अंग
बड़ी निराली जिन्दगी अजब गजब है ढ़ंग
राजनीति के फेर में मत कीजे बदरंग
भेद भाव सब भूलिए बनिए जी अब मीत
रंग डारिए प्रीत का होरी की ये रीत.. ...     महिमाश्री. 13-03-2016