Saturday, 21 May 2016

हम पढ़ेगें-हम बढ़ेगें- औरत के हक में ,गाँधी प्रतिष्ठान 27 फरवरी 2015, नई दिल्ली



मुझे संस्मरण सुनाने के लिए निमंत्रित किया गया था । समय 5 मिनट दिया गया था क्योंकि वक्ता बहुत थे। मैंने अपने जीवन में आए एक दलित महिला की जिजीविषा और एक सफाईकर्मी से बैंक के क्लर्क तक पहुँचने की अनोखी दास्तां सुनाई। यह संस्मरण मेरे जीवन की अमुल्य निधि की तरह है। मैंने उस स्त्री के हाथ में पखाने साफ करने के साजों -समान के बाद बैंक की कुर्सी पर बैठ के फाइलों को पढ़ते और सजाते देखा है।  वो आज भी सप्ताह में एक -दो बार मिल जाती है और मैं खुशी से फुले नहीं समाती । समय कम था और संस्मरण बहुत लम्बा अत: बहुत जल्दी-जल्दी बोलना पर रहा था ताकि उस स्त्री के संर्घष की सारी बात भी हो जाए और दिए गए समय में ही कर सकूं।

पूरा संस्मरण इत्मिनान से किसी दिन अपडेट कर दूँगी। अभी कागज पर उतारा नहीं है।
इस विडियों को एक मित्र ने सरप्राइज की तरह मुझे मेल कर गिफ्ट किया मुझे तनिक  भी  ये भान नहीं था कि  पूरे संस्मरण का वो विडियों बना रहा था अपने मोबाईल से । सच तो यह है, वे मेरे मित्र भी नहीं है बल्कि मेरी महिला मित्र के साथी हैं और उस वक्त मैं उनको जानती भी नहीं थी।उनका बहुत-बहुत आभार ।
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