Saturday, 21 May 2016

बिजली के सामने ढिबरी की क्या औकात...


बिजली के सामने ढिबरी कौन जलाए .?... तिसपर विडंबना यह कि दिल्ली में भी अब बिजली घंटो गायब रहने लगी है।.खैर! इसका फायदा यह हुआ कि बचपन के दिन याद आ गए।प्रतिदिन 3-4घंटे शाम को बिजली गायब होती । हम लालटेन और लैम्प की रौशनी में बैठ के पढ़ते। याद है रोज शाम होने से पहले उसकी साफ सफाई कर के रख दी जाती थी।पूजा घर में शाम की दीया- बाती के बाद दीए की टिमटिमाती रौशनी में माँ का संंध्या -वंदन चलता और वो कमरा अर्पूव शांति और अलौकिकता की रहस्मयी वातावरण से आलोकित हो जाता । अगर होमवर्क बनाने की जरुरत नहीं होती या पिताजी शहर से बाहर होते और नानी जी हमारे यहाँ आई होती तो लालटेन की लौ धीमी कर हम उनसे रोज शाम को कहानियाँ सुनने की फरमाइश करते हुए उन्हें घेर कर बैठ जाते और सोने से पहले तक सुनते रहते।बिजली की 24घंटे की आमद से सुविधाएं तो बढ गई.हम नित नई चीजों में व्यस्त हो गए. पर खुद से साक्षात्कार करने के अलौकिक एकांत और कल्पना की प्रकृति से दूर हो गए।



टिमटिमाती रौशनी स्याह अंधेरे में

उजास का एहसास देती 

अपनो के साथ जिन्दगी की मिठास देती 

दीए की मध्यम लौ में

रास्ते साफ और मंजिल पास होती 

हवाएं मल्हार गाती , 

जुगनू हथेलियों में बंद कर धीरे से खोलते ही

   आंखें  सपनों से भर जाती

हम  परियों के देश में विचरने लगते

  झिंगुर साथ में गुनगुनाते 

दूर पेड़ो से कोयल भी कुक कर साथ देती

पत्तों की सरसराहट कल्पनाओं के द्वार खोलती

दीदी को दूर से घोड़े की टाप सुनाई देती

भईया को भुत आता दिखाई देता

किस्से-कहानियों का संसार

दिये की लौ में हजार बार नई दुनिया दिखती

जादूगर, राजकुमार, बौने, शेर, भालु

सब आस-पास होते
बिजली के आते ही सब गायब 
उफ्फ! बहुत समय बर्बाद हुआ 
चलो! अब अपनी पढ़ाई करो
पिताजी का आदेश सुनाई देता
हम्म कौन कहता है  ?
बिजली उजालों की देवी, प्रगति की खान है
 आँखों में चकाचौंध और जीवन में तूफान लाती है
हम तेज रफ्तार से चलते-चलते 
यकायक उड़ने लगते हैं
उडते-उड़ते  कहीं खो जाते हैं ।
ढूढ़ना हमें जब तुम्हें कहीं दबा हुआ वो दीया मिले
जिसे माँ-नानी ने गंगा में प्रार्थना के साथ
हमें याद करते हुए बहाया था
उसे हाथों में लेकर नीम अंधेरे में जलाना
फिर धीरे से हमारा नाम लेकर बुलाना
यकीनन हम वापस आएगें
फिर से अपने आपको पाएगें

May 02, 2016 7:41pm
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