Monday, 2 May 2016

मजदूर दिवस के बहाने

दुनिया के मजदूरों एक हो यह एक मात्र नारा या कोई जुमला नहीं है ।एक मई को इस नारे की प्रसंगिकता बढ़ जाती है।यह अपने साथ याद दिलाता है, मजदूरों के संघर्षों और यातनाओं का लम्बा इतिहास।वर्तमान में मजदूरों की वास्तविक स्थितियाँ जो भी हो पर उनकी आवाजें नेपथ्य से ही सही यदा-कदा सुनाई पड़ती रहती हैं।
1848 के कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने पहली बार नारा दिया था - ‘‘दुनिया के मजदूरो, एक हो।’’ तब से जारी पूँजी के विरुद्ध श्रम के युद्ध में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने इतिहास के अलग-अलग मोड़ों पर अलग-अलग देशों में मज़दूर वर्ग का नेतृत्व किया और लाल झण्डे को साक्षी बना कर सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की समाजवादी समाज-व्यवस्था की बुनियाद रखने के लिये कदम बढ़ाया। 1917 की रूसी क्रान्ति, 1949 की चीनी क्रान्ति तथा द्वितीय विश्व-युद्ध के समापन से एक तिहाई धरती पर लाल झण्डे का राज कायम हो गया। लेनिन, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह, फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा और उनसे प्रभावित भारत  में भी साम्यवादी पार्टीया अस्तित्व में आई। तथा उनके विचारधारा को आगे बढ़ाया।

पश्चिम की औधौगिक क्रांति के बाद मजदूरो के काम की आमद तो बढ़ी, साथ ही उनका शोषण भी बढ़ा । 12 से 11 घंटे की कमरतोड़ मेहनत ने उनकी जिन्दगी को अपरिभाषित गुलामी में जकड़ डाला। सबसे पहले अमेरीका में मजदूरों ने अपने  नये आधुनिक शोषण को समझा और आवाज उठाना शुरु किया। 18वीं शताब्दी में अमरीका के आजादी की लड़ाई से शुरु हुआ मजदूर आंदोलन यूरोप होता हुआ इंग्लैंड पहुंचा। इंग्लैंड के मजदूर संगठन सबसे पहले मुखर हुए और 19 वीं सदी के अंत तक विभिन्न उद्योगो के कई मजदूर संगठनों के साथ मजबूती से मजदूरों के हक में अपनी बात रखने लगे। दैनिक काम के घंटे घटाने के लिए किया गया संघर्ष अति आरम्भिक तथा प्रभावशाली संघर्षों में एक था।

अमेरीका के मजदूर संगठन की पहली जीत :-
1.    10 घंटे काम प्रतिदिन
2.    बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था
3.    सेना में अनिर्वाय सेवा की समाप्ति
4.    मजदूरी की अदायगी
5.    मुद्रा में आयकर का प्रवधान

1886 तक श्रमिकों के काम करने की अवधि 8 घंटे  प्रतिदिन हो चुका था । मजदूर संगठन अपनी महत्ता समझने लगे थे और नगर पालिकाओं तथा विधान सभाओं इत्यादि में चुनान भी लड़ने लगे।
'सिंगारवेलु चेट्टियार' भारत के प्रभावशाली साम्यवादी नेता थे । सबसे पहले उन्होंने ही भारत में 1 मई को मजदूर दिवस के रुप में मनाने का विचार किया ।  इन्होंने किसान मजदूर संघ की स्थापना की।
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद राजनीतिक आन्दोलनों में काफ़ी तेज़ी आई, जिसके फलस्वरूप श्रमिक आन्दोलन मुख्य रूप से बलशाली हो गये। रूस में 1918 ई. की 'साम्यवादी क्रांति' ने भारतीय मज़दूर संघों को प्रोत्साहित किया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 'अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर संघ' (आई.एल.ओ.) की स्थापना हुई। वी.पी. वाडिया ने भारत में आधुनिक श्रमिक संघ 'मद्रास श्रमिक संघ' की स्थापना की। उन्हीं के प्रयासों से 1926 ई. में 'श्रमिक संघ अधिनियम' पारित किया गया।

अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ
संयुक्त राष्ट्र की इकाई के रुप में यह संगठन अंतरराष्ट्रीय आधारों पर मजदूरों तथा श्रमिकों के हितों के रक्षा के लिए नियम बनाता है।

गर्वनिंग बॉडी-
गर्वनिंग बॉडी अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन की रुप रेखा तैयार करता है। जिसमें 26 सरकारी प्रतिनिधि , 14 श्रमिक प्रतिनिधि और 14 कर्मचारी प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन
यह हर साल जून में जेनेवा में अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन आयोजित करता है। जिसे मजदूरों का संसद भी कहा जाता है।
जिसमें सभी प्रकार के एजेंडा को शामिल कर विचार विमर्श कर नई नीतियाँ और प्रस्ताव वोट के आधार पर पारित किया जाता है।
1998 में 86वां अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन में मजदूरों के मुलभूत कार्यों और अधिकारों को प्रस्तावित किया गया-
1.श्रमिकों को स्वतंत्र मोल-तोल का अधिकार
2.बंधुआ मजदूरी की समाप्ति
3.बाल श्रम की समाप्ति
4.मजदूरों के साथ होने वाले अन्यायपूर्ण भेद-भाव की समाप्ति

प्रमुख भारतीय मजदूर संगठन

1.भारतीय मजदूर संघ-(बी.एम.एस.)


भारतीय मजदूर संघ भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय मजदूर संगठन है। इसकी स्थापना भोपाल में महान विचारक स्व. दत्तोपंत ठेगड़ी द्वारा प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक के जन्मदिवस 23 जुलाई 1955 को हुई।
भारतीय मजदूर संघ अपने स्थापना काल से ही विश्वकर्मा जयंती, 17 सितम्बर को राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रुप में मनाता है।
भारतीय मजदूर संघ का नारा है-
1.मजदूरों दुनिया को एक करों !
2.देश के हित में करेंगें काम, काम का लेंगें पूरा दाम!
लक्ष्य और बीएमएस के प्रमुख उद्देश्य हैं:-
(क)भारतीय सामाजिक संरचना के अनुरुप व्यवस्था स्थापित      
   करना
1.  मानव शक्ति और संसाधनों का पूरा उपयोग कर पूर्ण रोजगार और अधिकतम उत्पादन के लिए अग्रणी|
2.  सभी व्यक्तियों में धन का समान वितरण, लाभ की मानसिकता को बदलकर सेवा भावना का विकास
3.  स्वतंत्र औधोगिक समुदाय का विकास
4.  राष्ट्र की अधिकतम औद्योगीकरण के माध्यम से हर व्यक्ति के लिए स्वतंत्र रुप काम करने का प्रावधान।

(ख)समुदाय के विकास के लिए मजदूरों के हित में कार्य
   
   करना तथा उनको और मजबूत करना
1.  धर्मों और राजनीतिक समानताएं की परवाह किए बगैर    
मातृभूमि की सेवा का एक माध्यम के रूप में ट्रेड यूनियनों में खुद को संगठित करने में श्रमिकों की सहायता करना।
2.  मार्गदर्शन करने के लिए प्रत्यक्ष, निगरानी और संबद्ध यूनियनों
की गतिविधियों का समन्वय। बीएमएस के घटक इकाइयों के रूप में अन्य राज्यों में बीएमएस इकाइयों और औद्योगिक फेडरेशन के गठन में संबद्ध यूनियनों की सहायता करना।
3.सभी ट्रेड यूनियनों के बीच एकता कायम करना।


(ग) श्रमिकों को सुरक्षित करने के लिए

1.श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा और काम के अधिकार के लिए समय समय पर हड़ताल और   उनके समस्या के निवारण के लिए आवाज उठाना
2. काम, जीवन और सामाजिक और औद्योगिक स्थिति की स्थिति में सुधार करना
3.औद्यौगिक घरानों में काम करने वाले मजदूरों को उनकी  
  मजदूरी को न्यूनत भागीदार के रुप में पार्टनर के तौर पर  
  शामिल करने का प्रयास
4.मजदूरों के हित में श्रम कानून का उचित संशोधन का प्रयास
5. कार्यकर्ता प्रशिक्षण कक्षाएं, अध्ययन कक्ष, अतिथि व्याख्यान,  
  सेमिनार, संगोष्ठियों, यात्रा आदि का आयोजन और श्रमिक  
  शिक्षा बोर्ड  के सहयोग  से श्रमिकों  को शिक्षित करने के लिए,
  लेबर रिसर्च सेंटर, विश्वविद्यालयों और  पुस्तकालयों की
  व्यवस्था करना आदि।



2.अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस )इंटक)

यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का मजदूर संगठन है। 3 मई1947 में इसकी स्थापना की गई। यह अन्य साम्यवादी मजदूर संगठनों की तरह आंदोलनकारी ना होकर मैनेजमेंट की तरह काम करता है।
इसका उदघाटन कांग्रेस के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी के हाथों हुआ था।

इंटक की कुछ प्रमुख नीतियाँ
1.समाज के हर व्यक्ति का सर्वागीण विकास को बढावा, उसे हर प्रकार के
 समाजिक , राजनीतिक आर्थिक शोषण से मुक्त करना
2. संगठन का मुख्य उदेश्य मार्गदर्शन और समन्वय स्थापित करना
 
3. ट्रेड यूनियनों के गठन में सहायता करने के लिए।
4.मजदूर वर्ग का सामाजिक नागरिक और राजनीतिक हित को बढ़ावा देने के
 लिए, श्रमिकों की सभी श्रेणियों को संगठन द्वारा सुरक्षित करने के लिए।
5.एक राष्ट्रव्यापी आधार पर प्रत्येक उद्योग के श्रमिकों के संगठन को बढ़ावा देना। 
6.श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के विभिन्न उपायों, दुर्घटनाओं के संबंध    
 में, मातृत्व, बीमारी, बुढ़ापे और बेरोजगारी में सहायता के लिए समुचित 
 प्रावधान शामिल करने के लिए ।
7. श्रमिकों की शर्तों के अनुरूप घंटे और काम के अन्य शर्तों को विनियमित
 करने और संरक्षण के लिए और ऊपर से अतिरिक्त श्रम के कानून के
 समुचित प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए।
8. कार्यकर्ताओं के बीच एकजुटता, सेवा, भाईचारे के सहयोग और आपसी सहायता की भावना को बढ़ावा।
9.श्रमिकों में उद्योग और समुदाय के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के लिए।
10.दक्षता और अनुशासन द्वारा मजदूरों का स्तर बढ़ाने का कार्य इत्यादि
 
 इसी प्रकार कई साम्यवादी छोटे-बड़े हजारों मजदूर संगठन हैं।जिनकी अपनी नीतियाँ हैं, जो सभी प्रकार के
छोटे-बड़े उधोगो में काम करने वाले मजदूरों के हितो के लिए काम कर रहे हैं।साथ ही समय-समय पर सरकार की
और पूंजीपतियों के अनुचित नीतियों के खिलाफ आंदोलन करते रहते हैं।आवाज उठाते रहते हैं।




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