Sunday, 10 December 2017

हसीनाबाद- गीताश्री

"हसीनाबाद" चर्चित कथाकार व पत्रकार गीताश्री का पहला उपन्यास है।  उपन्यास के नाम से ही स्पष्ट है कि नायिका प्रधान है। इस उपन्यास में खास बात है  वज्जिका संस्कृति और उस लोक की आत्मा , उसकी मिट्टी की सुगंध , जो अंत तक बांधे रहती है।  इसमें तीन औरते है, सुंदरी देवी, गोलमी कुमारी, और रज्जो। तीनों के माध्यम से लेखिका ने समय काल की स्त्रियों के संघर्ष को दिखाया  है।  सुंदरी देवी सामंती सत्ता में दबी कुचली वह स्त्री है जो हर सुबह अपने होने को तलाशती है।  जिसकी जिंदगी में हर रिश्ता अवैध है।जिसकी हर सांँस ठाकूर के रहमो करम पर अटकी है। जिसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता है। मगर  अपने भय पर विजय पा कर अपनी बच्ची के भविष्य के लिए अनजान व्यक्ति के साथ अनजान सफ़र पर निकल पड़ती है।

गोलमी को अपना भूत नहीं पता है मगर उसे क्या करना है , कहाँ जाना है, क्या पाना है उसकी आँखों में स्पष्ट है। उसे अपना लक्ष्य पता है और उसके लिए प्रतिबद्ध है।हृदय से भोली, निष्कलंक गोलमी का हृदय विशाल है और पृितसत्ता के हर चंगुल से आजाद सबको साथ लेकर आगे बढ़ती है और इस समाज से वो सम्मान और प्यार हासिल करती है जो हर स्त्री का हक है। इस तरह वह सुंदरी देवी के संघर्ष को भी मान दिलवाती है।

रज्जो का भी यहाँ जिक्र करना बहुत जरुरी है। नायिका  की चारित्रिक उँचाइयों के चित्रण के लिए ऐसे पात्र ही सहायक होते हैं। रज्जो  वो मतलबी व महत्वकांक्षी स्त्री है जो अपने   सपने पूरे करने के लिए अपनी दोस्त, अपने लोग, अपनी मिटटी को भी इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती।

गीता श्री  स्त्री विमर्श के लिए जानी जाती है। आप पर बोल्ड लेखन का यदा- कदा आक्षेप लगा है। मगर इस उपन्यास में ऐसा कुछ भी नहीं खोज पायेगें । बेहद सहज -संतुलित लेखन, कथा में प्रवाह इतना कि आप एक ही बैठकी में पढ़ जाएेंगे।

कहने को बहुत कुछ कहा जा सकता है। हसीनाबाद का दर्द है, लोक गीत की बहार है  ,राजनीति की दौड़ है , थोड़ी इतिहास की छौंक भी। प्रेम-दोस्ती, त्याग और धोखा भी ।

कई संवाद ऐसे है जो पढ़ते ही जुबान पर चढ़ जाते हैं।

जैसे "गोलमी सपने देखती नहीं बुनती है।"
बरहाल गीताश्री जी  को पहले उपन्यास के लिए बहुत बधाई।

Saturday, 9 December 2017

कविता 2017 दिसम्बर

1
ख्वाहिशे हजार वाट की आँखों में जलती हैं ।
जैसे गंगा में जलते हैं असंख्य दीये
गंगा आरती के आलाप के साथ ख्वाहिशे मन्नतों में बदलने लगती हैं।
मन्नतें फांसी बन जाती है.. बुधिया खेती करते कर्ज में डूब जाता है।

बाबुल मोहे काहे को ब्याहे विदेश..
ख्वाहिशों के दीये कुछ किनारे , कुछ बीच धार डूब जाते हैं
मुनिया की हसरतें छ्प्पर पर रख दी गई है।
बरसात एक दिन बहा देगी
कुछ चुल्हें की आग में झोंक देगी खुद ही.

कहीं टूटा है तारा
कई लह बुदबुदाते हैं अनायास
ख्वाहिशे फिर कहीं जागी है हौले हौले
अबकि बारिश हरी कर गई है हसरतें
बो गई है कई सपने
जगा गई हैं फिर उमंगे


2
वक्त की आँखों पर चढ़ा सदियों का सामंती धुंध
हर बार स्त्रीत्व को पऱखने के नये पौमाने गढे़

आत्मा पर चढ़े भय के कोहरे में कैद
एक ही धुरी पर घूमती रही स्त्री 

कोहरे को चीर नए रास्ते बनाने के जतन में
लहुलूहान करती रही सीना

जीवन के चाक पर अनजाने ही पीसती गई सपनो के बिरवे
कुचलती रही उँगलिया

एक दिन कहानी का पटाक्षेप होगा
बाऱिश की बुंदाबादी के बाद
आसमान के माथे पर लहकेगा सुनहरा सूरज

धरती के गर्भनाल से क्षितिज के सीने तक
समानता का सतरंगी इन्द्रधनुष चमकेगा
हरियायेगी धरती, टहकेगा बिरवा, फलेगा प्रेम
                                     महिमाश्री















कौन होनी चाहिए प्रेरणास्त्रोत- सीता,,रानी लक्ष्मीबाई ..या पद्मावती??

(सीता,रानी लक्ष्मीबाई,पद्मावती) सभी नारियों की परिस्तिथियाँ अलग थी और संदर्भ भी भिन्न थे। किसी का भी आचारण और निर्णय लेने की क्षमता उसके संघर्ष की जमीन और कारण में निहित होता है। सीता निसंदेह आत्मसम्मान से लबरेज़ महिला थी पर उनके जीवन को पति पत्नी , परिवार और समाज के संदर्भ में आदर्श मानना बेहतर हैं। वे एक विदुषी महिला, आत्मसम्मानी पत्नी, आदर्श माँ, बेटी और परिस्थितियों के अनुकूल एक बहादुर स्त्री थी। रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए उनका अपहरण करता है और उनकी प्रतिभा और सुंदरता से प्रभावित होकर पाना तो चाहता है पर बलात नहीं। वो वासना में पागल नहीं था। लक्ष्मी बाई को भी अंग्रेज अपने हरम में शामिल नही करने गए थे ना ही उनके लिए पागल थे। वे भारत के अन्य स्टेट की तरह झांसी को अपने अधीन करने गए थे। यहां न प्रेम है न ही सौंदर्य और न स्त्री के किये वासना। रही बात पद्मावत की तो ये जायसी ने पद्ममावत में राजा रानी के प्रेम को चित्रित किया है।पद्मिनी व रत्नसेन के प्रेम के मध्य ख़िलजी किसी भी प्रेम कहानीमें विलेन की तरह है। खिलजी पदमिनी और रत्नसेन के प्रेम के बीच खलनायक बन कर आता है जो पद्मावती को पाने के लिए हर कुकर्म करने को पागल है। विवाहित स्त्री के हवस में डूबा ख़िलजी अपनी सेना लेकर टूट पड़ता है। पदमिनी लड़ती जरूर लड़ती पर उसके पहले ही रत्नसेन दूसरे राजा द्वारा जिसने पद्मिनी को प्रेम पत्र लिख के उसे पाने का इजहार किया था उससे लड़ने में घायल हो जाते हैं और ख़िलजी के आक्रमण तक उनका प्राण पखेरु उड़ जाता है। प्रेम में डूबी स्त्री अपने प्रेमी पति की मृत्यु से आहत हो जाती है। ख़िलजी की विशाल सेना से हारने के बाद विधवा स्त्रियां अपनी रानी के साथ राजा की मृत्युं के कारण भयभीत हो कर जौहर कर लेती है। क्योंकि अंग्रेज हारी हुई प्रजा के स्त्रियों के साथ बलात्कार या हरम में शामिल नही करते थे न बोली लगाते थे मगर मुग़ल और अन्य मध्यकालीन आततायी का उद्देश्य ही होता था लूट खसोट ,औरतो का बलात्कार करना ,बेचना और जबरन धर्मपरिवर्तन । जौहर का पक्ष नही ले रही हूं पर जिनका नाम लिया गया है वे सभी अलग अलग परिस्थितियों में लिए गए अपने निर्णय के लिए जानी जाना चाहिए ना की उनका आपस मे तुलना होना चाहिए।

पद्मावती विवाद और भरतमुनी का नाट्य शास्त्र

भरतमुनि के अनुसार नाट्य प्रदर्शन की मुख्य रुप से दो शैलिया होती हैं " लोकधर्मी "और "नाट्य धर्मी".
लोकधर्मी वह शैली है जिसमें लोक का यर्थाथ वर्णन किया जाता है। जैसा समाज है, जैसे लोग हैं, जैसी उनकी समस्याएं इन सब की प्रस्तुति इस ढंग से कि जाए वह वास्तविक लगे। लोकधर्मी शैली के अर्तगत कला सिनेमा को रख सकते हैं। लोकधर्मी शैली में कल्पना नहीं होती । लोकधर्मी में समाज का वास्तविक चित्रण होता है।
नाटयधर्मी शैली कल्पनाशीलता पर आधारित होता है। इसमें लोक व्यवहार की घटनाओं को कुछ परिवर्तित कर अथवा अपनी ओर से कुछ जोड कर प्रस्तुत किया जाता है।इसमें झूमते - नाचते अभिनेता संवाद कहता है।  गीत, संगीत का समावेश होता है। मनोरंजन के तत्व ज्यादा होते हैं। बालीवुड की मसाला फिल्मों को इसी शैली में रखा जा सकता है।
भारतीय रंगमंच की कला का प्रदर्शन इसी दो शैली पर आधारित है।
भंसाली की फिल्में नाटयधर्मी शैली का बेजोड नमूना है। वे एक लाजबाव चितेरा हैं। अपनी कल्पना से रंगीनविशाल कैनवस रंचते है। जिसकी सुंदरता में दर्शक ऐसे डूबते हैं कि तीन घंटे कैसे बीत जाते है पता नहीं चलता। वे हमारे समय के महत्वपूर्ण बेमिसाल निर्देशक हैं।
पद्मावती निंसदेह बहुत ही खूबसूरत फिल्म होगी.। बिना देखे उस पर बोलना गलत हैं। अगर उन्हेोंने किसी ड्रीम सिक्वेंश में पद्मावती को खिलजी की बांहो में दिखाया है तो गलत कैसे हो सकता है। इसे आप बिना देखे प्रेम-प्रसंग दिखाना कैसे कह सकते हैं। अपनी कल्पना से किसी गाने में खिलजी के लस्ट को दिखाने की कोशिश की होगी। पद्मिनी के प्रति उसकी आसक्ति, उसे पाने की लालसा को दिखाया होगा। ये मेरा अनुमान है। और ऐसा दिखाया है तो स्वाभाविक है। क्योंकि कोई भी पुरुष अगर किसी स्त्री पर आसक्त है तो अकेले में उसे ऐसे ही सोचेगा। इसमें अपमान की बात कहाँ से आ गई। ये फिल्म है दोस्तों । उन्होंने कोई डोक्यूमेंट्री नहीं बनाई ।
और नाट्यशैली में रची बसी फिल्मों सें कल्पना का सहारा ले अंगो के माध्यम से किसी दृश्य को साकार किया जाता है। जिसे आंगिक अभिनय कहा जाता है।
क्या टीवी सीरियलों में कथानक नहीं बदले जाते। मैंने चंद्रगुप्त मौर्य पर आधारित सीरियल "चद्र नंदिनी" के कुछ एपिसोड देखे । इतिहास से उसका दूर दूर तक का नाता नहीं था। फिर भी सीरियल चलता रहा। ऐसे एक नहीं कई सोप चलते रहते हैं और दर्शक देखते भी रहते हैं।जिसमे ऐतिहासिक पात्रों का नाम, परिवेश, औ पोशाक इस्तेमाल किया जाता है पर कहानी कुछ और दिखाई जाती है।

Saturday, 20 May 2017

सरकार और नक्सलियों के बीच पीसते आदिवासी

बीते कुछ सालों में जब भी सरकार दावा करती है कि देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। उसके कुछ महीने बाद ही नक्सली सेना पर दुर्दांत हमला कर आंतक का ऐसा कहर बरपाते है कि महीनों भोले-भाले आदिवासियों और सरकार की नींद उड़ जाती है।
ऐसा ही आतंक फिर से 24 अप्रैल को सुकमा जिले के बुरकापाल में नक्सलियों ने बरपाया। आदिवासी महिलाओं को आगे कर सीआरपीएफ के 26 जवानों को भून डाला गया।सीआरपीएफ के ये जवान उन मजदूरों के सुरक्षा के लिए तैनात थे जो दो हाईवे को जोड़ने वाली सड़क बना  रहे थे। बताया जा रहा है कि 300 नक्सलियों में 50 महिला नक्सली भी शामिल थी।इस हमले के बाद बुरकापाल में दहशत के बादल छाये हुए हैं। आदिवासियों के ऊपर डर और प्रताड़ना के दो धारी तलवार लटक रहे हैं।
आस-पास के सभी गाँव वीराने हो गये है । गाँव में दूर दूर तक कोई नजर नहीं आता।गाँव की ये वीरानी बेहद डरावनी है ।इका दुका महिलाएं और कुछ बुजर्ग दिख जाते हैं । मगर वे भी बातचीत से बचना चाहते हैं। उनका कहना है कि अधिकांश गाँववाले माओवादिओं के डर और सुरक्षा बलो के पूछताछ से बचने के लिए भाग गये हैं।
नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच फंसी आदिवासी जनता की जान सांसत में फंसी हुई है। भय और असुरक्षा के बीच दो पाटो में पीस रही है।
यह पहली घटना नहीं है।इससे भी बड़ा हमला नक्सलियों ने 2010 में  दातेवाड़ा के पास कर सीपीआरएफ के 76 जवानों को भून डाला  था
पहले से ही इन इलाको में अथाह गरीबी है।खाने के लिए राशन तक नहीं है। किसी भी प्रकार का रोजगार, अस्पताल और स्कूल नहीं है। आदिवासी महिलाओं और बच्चियों के साथ आये दिन दुर्व्यवहार और शारीरिक शोषण , बलात्कार आम बात है। स्थानीय पुलिस हर आदिवासी को नक्सलियों से मिला समझकर शक की निगाह से देखती है। सब पर कड़ी नजर रखती है।थोड़ा सा भी संदेह होने पर उन पर जुल्म करती है। कई बार उन्हें फर्जी मामलों में पकड़ कर जेल में  भी डाल देती है।
पुलिस और सीआरपीएफ मान के चलते हैं कि ये आदिवासी नक्सलियों से मिले हुए होते हैं। किसी भी घटना के बाद सीआरपीएफ उन्हें डरा धमका के जाती है।
उधर नक्सली भी इन भोले आदिवासियों को सीआरएफ और पुलिस से बचाव के लिए इस्तेमाल करते हैं।साथ ही उन्हें पुलिस का मुखविर समझ कर संदेह भी करते है। कभी भी माओवादी उनके गांव में आ कर फर्मान जारी कर जाते हैं कि गाँव खाली कर दो।
जंगलों, पहाड़ो से ढकी छत्तीसगंढ की धरती खनिज संसाधनों से पटी हुई है। यहाँ की मिट्टी सोना, हीरा , कोयला , लोहा सब उगलती है। ।सरकार और निजी कम्पनियों द्वारा जब अंधाधुन खनन शुरु हुआ तो उसके लिए हरे-भरे पेड़ काटे जाने लगे थे । उत्खनन के लिए हजारों पेड़ों की बलि दे दी गई।जिसका असर वहाँ की नदियों पर भी पड़ा। वो सुखने लगी। आस-पास खेती लायक जमीने नहीं बची। आदिवासियों की उपजाऊ जमीने बंजर हो गई और साथ ही सदियों से चले आ रहे आदिवासियों की जीवन-पद्धति भी बिगड गई। आदिवासी नहीं चाहते थे कि उनके संसाधन छिने जाए । होना तो यह चाहिए था उनकी जमीनों पर खनन के बाद हुए लाभ में सरकार को शेयर देना चाहिए था। परंतु आदिवासियों के  हाथ कुछ भी  नहीं आया। बल्कि अपनी धरती से वे बेदखल कर दिए गए। नक्सली इस समस्या का फायदा उठा कर इन क्षेत्रों में फैल गए । आतंक का पर्याय नक्सलवाद अब यहाँ एक उधोग बन चुका है। वे सरपंच को मार देते हैं। गाँव में पटवारी को आने नहीं देते।
जाहिर है नक्सली इन इलाकों में विकास नहीं होने देना चाहते । विकास का मतलब है , सड़क, रोजगार, स्कूल, अस्पताल, पुलिस चौकी, सुरक्षा और सरकारी तंत्र द्वारा सब कामकाज। नक्सली अपनी समनान्तर सरकार चलाना चाहते हैं।एक खास विचारधारा को पोषित कर अपनी मनमानी करना चाहते हैं।जंगल से गांव , गांव से शहर तक अपना सम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं।
2005 में सलमा जुडूम को बैन करने के बाद आदिवासियों के पुर्नस्थापन के लिए सरकार ने कई योजनाएँ बनाई। मगर वे सिर्फ कागजी ही रह गई जमीनी तौर पर कभी भी कार्यन्वयन नहीं हुआ। आंतक के साये में जी रहे आदिवासी पहले भी अपनी धरती छत्तीसगढ़ के कई  नक्सल प्रभावित इलाको से पलायन कर आंध्र और दूसरे राज्यों में जा कर बस गये । मगर वहाँ भी नारकीय जीवन जी रहे हैं।
इन समस्याओं के जानकारों का कहना है कि अगर राज्य सरकार चाहे तो नक्सलवाद को समूल खत्म कर सकती है। इसके लिए केंद्र सरकार , राज्य सरकार, राज्य पुलिस , और मिलिट्री फोर्स की टीम बननी चाहिए। जिनका आपस में सही तालमेल हो। साथ ही नक्सवादियों से शांतिवार्ता भी करने का प्रयास होना चाहिए।साथ ही आदिवासी समुदाय को अपनी धरती अपने संसाधनों पर हक के साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान किया जाना चाहिए।