Saturday, 20 May 2017

सरकार और नक्सलियों के बीच पीसते आदिवासी

बीते कुछ सालों में जब भी सरकार दावा करती है कि देश से नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। उसके कुछ महीने बाद ही नक्सली सेना पर दुर्दांत हमला कर आंतक का ऐसा कहर बरपाते है कि महीनों भोले-भाले आदिवासियों और सरकार की नींद उड़ जाती है।
ऐसा ही आतंक फिर से 24 अप्रैल को सुकमा जिले के बुरकापाल में नक्सलियों ने बरपाया। आदिवासी महिलाओं को आगे कर सीआरपीएफ के 26 जवानों को भून डाला गया।सीआरपीएफ के ये जवान उन मजदूरों के सुरक्षा के लिए तैनात थे जो दो हाईवे को जोड़ने वाली सड़क बना  रहे थे। बताया जा रहा है कि 300 नक्सलियों में 50 महिला नक्सली भी शामिल थी।इस हमले के बाद बुरकापाल में दहशत के बादल छाये हुए हैं। आदिवासियों के ऊपर डर और प्रताड़ना के दो धारी तलवार लटक रहे हैं।
आस-पास के सभी गाँव वीराने हो गये है । गाँव में दूर दूर तक कोई नजर नहीं आता।गाँव की ये वीरानी बेहद डरावनी है ।इका दुका महिलाएं और कुछ बुजर्ग दिख जाते हैं । मगर वे भी बातचीत से बचना चाहते हैं। उनका कहना है कि अधिकांश गाँववाले माओवादिओं के डर और सुरक्षा बलो के पूछताछ से बचने के लिए भाग गये हैं।
नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच फंसी आदिवासी जनता की जान सांसत में फंसी हुई है। भय और असुरक्षा के बीच दो पाटो में पीस रही है।
यह पहली घटना नहीं है।इससे भी बड़ा हमला नक्सलियों ने 2010 में  दातेवाड़ा के पास कर सीपीआरएफ के 76 जवानों को भून डाला  था
पहले से ही इन इलाको में अथाह गरीबी है।खाने के लिए राशन तक नहीं है। किसी भी प्रकार का रोजगार, अस्पताल और स्कूल नहीं है। आदिवासी महिलाओं और बच्चियों के साथ आये दिन दुर्व्यवहार और शारीरिक शोषण , बलात्कार आम बात है। स्थानीय पुलिस हर आदिवासी को नक्सलियों से मिला समझकर शक की निगाह से देखती है। सब पर कड़ी नजर रखती है।थोड़ा सा भी संदेह होने पर उन पर जुल्म करती है। कई बार उन्हें फर्जी मामलों में पकड़ कर जेल में  भी डाल देती है।
पुलिस और सीआरपीएफ मान के चलते हैं कि ये आदिवासी नक्सलियों से मिले हुए होते हैं। किसी भी घटना के बाद सीआरपीएफ उन्हें डरा धमका के जाती है।
उधर नक्सली भी इन भोले आदिवासियों को सीआरएफ और पुलिस से बचाव के लिए इस्तेमाल करते हैं।साथ ही उन्हें पुलिस का मुखविर समझ कर संदेह भी करते है। कभी भी माओवादी उनके गांव में आ कर फर्मान जारी कर जाते हैं कि गाँव खाली कर दो।
जंगलों, पहाड़ो से ढकी छत्तीसगंढ की धरती खनिज संसाधनों से पटी हुई है। यहाँ की मिट्टी सोना, हीरा , कोयला , लोहा सब उगलती है। ।सरकार और निजी कम्पनियों द्वारा जब अंधाधुन खनन शुरु हुआ तो उसके लिए हरे-भरे पेड़ काटे जाने लगे थे । उत्खनन के लिए हजारों पेड़ों की बलि दे दी गई।जिसका असर वहाँ की नदियों पर भी पड़ा। वो सुखने लगी। आस-पास खेती लायक जमीने नहीं बची। आदिवासियों की उपजाऊ जमीने बंजर हो गई और साथ ही सदियों से चले आ रहे आदिवासियों की जीवन-पद्धति भी बिगड गई। आदिवासी नहीं चाहते थे कि उनके संसाधन छिने जाए । होना तो यह चाहिए था उनकी जमीनों पर खनन के बाद हुए लाभ में सरकार को शेयर देना चाहिए था। परंतु आदिवासियों के  हाथ कुछ भी  नहीं आया। बल्कि अपनी धरती से वे बेदखल कर दिए गए। नक्सली इस समस्या का फायदा उठा कर इन क्षेत्रों में फैल गए । आतंक का पर्याय नक्सलवाद अब यहाँ एक उधोग बन चुका है। वे सरपंच को मार देते हैं। गाँव में पटवारी को आने नहीं देते।
जाहिर है नक्सली इन इलाकों में विकास नहीं होने देना चाहते । विकास का मतलब है , सड़क, रोजगार, स्कूल, अस्पताल, पुलिस चौकी, सुरक्षा और सरकारी तंत्र द्वारा सब कामकाज। नक्सली अपनी समनान्तर सरकार चलाना चाहते हैं।एक खास विचारधारा को पोषित कर अपनी मनमानी करना चाहते हैं।जंगल से गांव , गांव से शहर तक अपना सम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं।
2005 में सलमा जुडूम को बैन करने के बाद आदिवासियों के पुर्नस्थापन के लिए सरकार ने कई योजनाएँ बनाई। मगर वे सिर्फ कागजी ही रह गई जमीनी तौर पर कभी भी कार्यन्वयन नहीं हुआ। आंतक के साये में जी रहे आदिवासी पहले भी अपनी धरती छत्तीसगढ़ के कई  नक्सल प्रभावित इलाको से पलायन कर आंध्र और दूसरे राज्यों में जा कर बस गये । मगर वहाँ भी नारकीय जीवन जी रहे हैं।
इन समस्याओं के जानकारों का कहना है कि अगर राज्य सरकार चाहे तो नक्सलवाद को समूल खत्म कर सकती है। इसके लिए केंद्र सरकार , राज्य सरकार, राज्य पुलिस , और मिलिट्री फोर्स की टीम बननी चाहिए। जिनका आपस में सही तालमेल हो। साथ ही नक्सवादियों से शांतिवार्ता भी करने का प्रयास होना चाहिए।साथ ही आदिवासी समुदाय को अपनी धरती अपने संसाधनों पर हक के साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान किया जाना चाहिए।